साहित्य सरोज पत्रिका का साप्ताहिक लेखन प्रतियोगिता 02
इंतजार
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खत तुम्हारे लिए, हाथों में अब भी
बस निहारे जा रहा हुं
तुम बेजार सी चली जा रही हो
अंजान होके मुझसे
माना खता थी मेरी
पर यू ना ठुकरा के जाओ दिलबर
कुछ वक्त का था तकाजा
कुछ बेबसी थी मेरी
फासले यूं बढ़ते गए
कि अजनबी हो गए खुदी से
ना भुला हु, तुझे एक पल को
बसी है सांसों में खुशबू तेरी अब भी
वक्त बेवक्त तेरा वो खिलखिलाना
पायल की तेरी वो रुनझुन
माथे की दमकती लाल बिंदी
अब भी सीने में है मेरे धड़कती
ना रूठों अब ए दिलबर
मान भी जाओ ए सितमगर
आ लौट चलो हमदम मेरी
अब ना होगी कोई गलती
इंतजार हैं तुम्हारा
घर सूना है बिन तुम्हारे
शशि सराफ
कोलकाता
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