मजदूर दिवस पर विशेष
कभी देखा है माँ की थिरकती उंगलियों को
जो नित मधुर वचन से सिर पर हाथ फेर
लग जाती अपने निमित खुद ही बाँध लिये कर्म में
जिसकी मजदूरी सिर्फ प्यार और सम्मान ।
सोचा है कभी चूल्हे से जले हाथ पर ख़ुद ही गीला आटा लगाती
मुस्कुराती,
पल्लू से पौंछती तुम्हारी थाली
गर्म परोसती
बस खुश होती देख मुँह में जाते निवाले को
मजदूरी, तुम्हारी मनुहार बस खुशी झलकती चेहरे पर।
ताप से जलती ,उठ करती प्रभुवन्दन
चढ़ाया दूध, चाय का पानी घोलती मिठास
नही देखी आँसू से भीगी कोर आंखों की
जो पौंछ रही पल्लू से
क्या चाहिए ?
बस थोड़ी सी पूछ
क्यों माँ ठीक हो ना ?
श्रम दिवस पर इधर उधर के श्रम लिखते हम सभी
क्यों नही जाता ध्यान कभी
माँ की निरन्तर श्रम में जुटी देह पर
जो कर्मठ करती काम किसी प्रत्युपकार में नही
अपने ही द्वारा थोपे गई श्रम को करती रहती निष्काम यूँ ही।
स्वरचित
निशा"अतुल्य"
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