भारतीय न्याय व्यवस्था में धारा 125 (वर्तमान कानूनी व्यवस्था में उसके समकक्ष प्रावधानों सहित) का उद्देश्य आर्थिक रूप से असहाय पत्नी, बच्चों और माता-पिता को संरक्षण देना था, ताकि कोई भी व्यक्ति अभाव और भूख का शिकार न हो। लेकिन आज इसका जम कर दुरूपयोग हो रहा है। जरा सा विवाद हुआ नहीं कि अलगाव हो जाता है और फिर मांग शुरू होती है एलिमनी की। बड़ी अजीव विडम्बना है कि न तलाक लेगें, न साथ रहेगें मगर एलिमनी लेगें उसके साथ 10-20 लाख रूपये लेगेे। आखिर क्यों? यह बात मेरी समझ में नहीं आती। जब साथ नहीं निभ रहा है और अलग-अगल रहना है तो अपनी अपनी जिम्मेदारियों को भी खुद निभायें। पति के साथ रहेगें नहीं, उसका चेहरा देखेगें नहीं, जिम्मेदारी निभायेगें नहीं, उसकी खुशियों से खुश होगें नहीं, उनके कार्यो को सही मानेगें नहीं, उसके माता-पिता से प्रेम करेगें नहीं। हर बात में गलितयां ही गलतियां निकालेगें, खुद को सक्षम बतायेगें, बराबरी का हक मांगेंगे लेकिन एलिमनी को सही ठहरायेंगें, उसके पैसे को सही मानेगे, उससे पैसा लेगें। यह कहां का न्याय है।
आज की महिलाएं भी पढ़ी-लिखी है, अपने पैरों पर खड़ी हो रही है, तो फिर अगल रहने का फैसला करने से पहले अपने लिए रोजगार क्यों नहीं खोजती हैं। रोजगार करें और तलाक लें। कुछ महिलाएं कहती है कि विवाह के दौरान परिवार के लिए अपना करियर छोड़ा है, वर्षों तक घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाई है या बच्चों की परवरिश के कारण रोजगार से दूर रहा हो, तो अलगाव के बाद तत्काल आत्मनिर्भर होना कठिन हो सकता है। यह बातें कोर्ट-कचहरी में तो ठीक है लेकिन हकीकत के धरातल पर नहीं, कोई भी रोजगार करना चाहेगा तो उसे महीने के अंदर नहीं करोड़ो के लेकिन जीवन यापन के लिए कार्य मिल जायेगा। मगर जब जमीर जिन्दा हो तो। जब जमीर ही मर जाये तो फिर कोई बात ही नहीं।
यदि एलिमनी जरूरी है तो वह जीवन-यापन के बराबर ही होना चाहिए यह नहीं कि पति 5 करोड़ कमा रहा है तो उसमें उसे 3 करोड़ चाहिए। पति करोड़ो कमाये या अरबों एलिमनी एक दैनिक दिहाड़ी की तरह 10-12 रूपये जिसमें दो टाइम का भोजन, कपड़ा एक साधारण सी छत मिल जाये उतनी होनी चाहिए, उससे अधिक की आशा है तो तलाक देकर दूसरा विवाह करें। आखिर पुरूष का दोष क्या है जो वह एलिमनी दे, क्या यही कि उसने विवाह किया यदि विवाह करना दोष है तो दोषी तो पत्नी भी है जो घर बैठे पैसा पा रही है। जबकि एलिमनी देने वाले पुरूष को क्या मिल रहा है, एकांतवाश, अपनी जिम्मेदारी स्वंय, दिन भर आफिस, मजदूरी और शाम को सुना घर, सूनी सेज।
वर्तमान समय में 90 प्रतिशत मामलों में अंहकार और खुद को सही मानने, दूसरों को गलत, और भौतिकता के स्वंय प्रयोग के साथ-साथ जिम्मेदारीयों से भागना ही अलगाव का मुख्य कारण है। स्वतंत्रता एवं स्वछंदता के बीच का अंतर लोगो को समझ में ही नहीं आता। स्वछंदता से रोकते पति को पत्नी अपना दुश्मन मान लेती है। उसे यह अहंकार हो जाता है कि वह अपने पति के बिना भी जीवन यापन कर लेगी। जवानी में तो यह बात सही भी लगती है, लेकिन जैसे-जैसे उम्र की गेद सीमा रेखा की तरफ जाती है, तन्हाई का रन बढ़ता जाता है। एक गिलास पानी के लिए भी हम दूसरों या नौकरो पर आश्रित हो जाते हैं। तब याद आती है दाम्पत्य की। लेकिन इतना सोचने का समय किसके पास है। वह वर्तमान से बाहर निकल ही नहीं पाता।
आज विवाह के बाद अलग रहते हुए एलिमनी एक जरूरत नहीं फैंशन बन चुका है। तलाक नहीं लेगें लेकिन अलग रहेगें, और साथ रहने की जब बात होगी तो शर्ते रखेगें कि पति अलग मकान लेकर रहे, पति के मां बाप हमारे साथ नहीं रहेगें, उसके परिवार का कोई नहीं आयेगा, उसके पैसों पर केवल उसका अधिकार होगा, और तो और आरोप लगाया जाता है कि यदि हम पति के परिवार के साथ रहे तो हमारी जिन्दगी पर खतरा है।
विवाह का अर्थ केवल पति-पत्नी का साथ नहीं, बल्कि दोनों परिवारों का सम्मान भी है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। जिस माता-पिता ने अपने बच्चों का पालन-पोषण किया, उन्हें शिक्षित किया, संघर्षों में उनका साथ दिया और अपने जीवन का बड़ा हिस्सा उनके भविष्य के लिए समर्पित कर दिया, वृद्धावस्था में वही संतान उनका सबसे बड़ा सहारा होती है। ऐसे में यदि किसी वैवाहिक विवाद के दौरान पति के सामने यह स्थिति उत्पन्न होती है कि उसे अपने माता-पिता और अपने वैवाहिक जीवन में से किसी एक को चुनना पड़े, तो यह केवल पारिवारिक नहीं बल्कि नैतिक संकट भी बन जाता है। विवाह अधिकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि कर्तव्यों की साझेदारी है। पति यदि पत्नी और उसके परिवार का सम्मान करे तो पत्नी से भी यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह पति के माता-पिता को अपना सम्मान दे। परिवार शर्तों पर नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद, सहनशीलता और परस्पर सम्मान पर चलते हैं। जहाँ रिश्ते शर्तों पर टिकने लगते हैं, वहाँ टूटन की शुरुआत हो जाती है।
इन्हीं पारिवारिक परिस्थितियों के बीच जब वैवाहिक संबंध टूटते हैं, तब सबसे बड़ा विवाद आर्थिक जिम्मेदारियों को लेकर खड़ा होता है। यदि दोनों साथ नहीं रहना चाहते, तो क्या आर्थिक संबंध जीवनभर बने रहने चाहिए? यदि दोनों शिक्षित हैं, स्वस्थ हैं और रोजगार करने में सक्षम हैं, तो क्या दोनों को अपने-अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वयं नहीं उठानी चाहिए? यही वे प्रश्न हैं जो आज एलिमनी और भरण-पोषण की व्यवस्था को लेकर समाज में बहस का विषय बने हुए हैं। यदि विवाह समाप्त हो चुका है और दोनों अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हैं, तो सक्षम व्यक्तियों के बीच स्थायी आर्थिक निर्भरता की व्यवस्था पर पुनर्विचार होना चाहिए। क्योंकि तनाव केवल महिलाएं नहीं पुरूष भी झेलते हैं। एलिमनी दोषी है आज बढ़ते परिवार विच्छेदन की। न्यायालय को भी पुरूषों की यह बात माननी पड़ेगी कि आपसी विवाद को दूर करते हुए हम अपने माता-पिता की जिम्मेदारी निभायेगें, अपने परिवार के साथ रहेगें, पत्नी को पूरे सम्मान के साथ अपने पास रखेगें लेकिन उसकी अपने माता-पिता या समाजिक सेवा न करने की बात नहीं मानेगें। यदि पत्नी साथ रहती है तो ठीक अन्यथा हमें तलाक दिया जाये, हम एलिमनी नहीं देेगें, हमें किनारा करेगें।

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