कैक्टस से नाता-शीला श्रीवास्‍तव

मई माह चल रहा था धूप, लू से अपना बचाव करने के लिए सभी अपने-अपने ढंग से बचाव कर रहे थे, इन दिनों स्कूल, कॉलेज की परीक्षाओं का दौर रहता हैl 

आज प्रकाश के बी.ए. फाइनल का अंतिम पेपर था, पेपर दूसरी पारी में होना था, प्रकाश की माँ ने उसे आम का पना पिलाया कि गर्मी का कोई असर ना हो बेटा अच्छी तरह पेपर दे, पति की मृत्यु के बाद यही बेटा उनका और बेटी का सहारा था l

प्रकाश तैयार हो कर माँ के चरण स्पर्श कर बोला, माँ पेपर देने जा रहा हूँ, माँ ने  झट से चम्मच से दही खिलाया और आशीष दीl 

प्रकाश जैसे ही परीक्षा कक्ष में पहुँचा दरवाजे से किसी ने आवाज दी, साहब सुनिए, उसने मुड़ कर देखा तो उसे ऑफिस का चपरासी खड़ा दिखा, क्या है, उसने कहा, चपरासी ने एक लिफाफा देते हुए कहा, यह बड़े साहब ने दिया है और लिफाफा प्रकाश को दे वह चला गया l

प्रकाश ने सोचा परीक्षा शुरू होने में १५ मिनट बाकी है क्यों न इसे खोल कर देख लूँ , उसने लिफाफा खोला तो आवाक रह गया उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई उसकी नौकरी रद्द कर दी गई थी, यह क्या मेरी नौकरी, अब घर का खर्च कैसे हो पाएगा l

इतने में घंटा बज गया उसने सब किताब और लिफाफा सामने टेबल पर रख अपनी कुर्सी पर बैठ गया आँखों के सामने हजारों कैक्टस दिखने लगे l

प्रो. तिवारी प्रकाश को बड़े गौर से देख रहे थे और सोचने लगे आज यह परेशान क्यों है?

वह उसे कापी देने पास आए पूछा प्रकाश क्या बात है,” उसने टेबल पर रखे लिफाफे की तरफ इशारा किया ज्यादा कुछ बोल नहीं पाया सिर झुका लिया” 

प्रो. साहब ने लिफाफा खोला और पढ़ा वह भी परेशान हो गए क्योंकि उन्हें पता था कि प्रकाश किस परिस्थिति में नौकरी कर रहा है, उसके पास आकर सिर पर हाथ फेर बोले बेटा परीक्षा ध्यान से दो मैं सब संभाल लूँगा, *प्रकाश को लगा जैसे किसी ने घाव पर मरहम लगा दिया हो “

परीक्षा समाप्त हुई वह प्रो. साहब से मिलकर जाने लगा!उसके पैर घर के लिए आगे बढ़े ही नहीं रहे थे माँ, बहन को क्या बताऊँगा? 
वह एक मंदिर के चबूतरे में बैठ गया हे ईश्वर तू  मेरे जीवन में परीक्षा क्यों लै रहा है l

प्रो. साहब की बेटी और प्रकाश की बहन साथ ही पढ़ती थी, प्रो. साहब घर आए  तो दोनों को बैठी पाकर बोले ऊषा आज बुरी खबर है। 
पर तू समझदार है तू बात सँभाल लेगी !आज प्रकाश को नौकरी से हटा दिया है  वह घर पहुँचे तो तू समझदारी से काम लेना।
 ऊषा घबरा कर उठी कही भईया पहले न पहुँच जाएं यह सोच कर?


वह जानती थी कि भईया को पिता की जगह अनुकम्पा नौकरी मिली थी! क्लर्क की नौकरी थी पर घर के हालात को देखते हुए बहुत आवश्यक थी l 

प्रकाश के पिता सरकारी महकमे में अफसर थे कमाई भी अच्छी थी, बड़ी बेटी की शादी भी एक सरकारी अफसर से हो गई थी वह इलाहाबाद में पति के साथ रहती थी, प्रकाश ऊषा पढ़ रहे थे, खुशहाल परिवार था l पिता अपनी कमाई बैंक में न जमा कर अपने विश्वसनीय दोस्त के बिज़नेस के लिए पैसा उसके पास जमा कर देते थे! वह हर माह ब्याज भी दे जाता था।
  मूल धन सुरिक्षित था, “उन्हें टैक्स भी नहीं भरना पड़ता था” इनकम टैक्स बचाने के चक्कर में l 

जीवन में कब क्या घटित हो कोई नहीं जानता प्रकाश के पिता के मित्र का दिवाला निकल गया!वह अपने को दिवालिया घोषित कर कानपुर छोड़कर पता नहीं कहाँ चला गया!प्रकाश के पिता को बहुत बड़ा आघात लगा कि अब बच्चों की पढ़ाई, शादी कैसे होगी वेतन तो घर खर्च में ही चला जाता है l 

प्रकाश की माँ सुमन ने सुना तो पति को धैर्य बांधते हुए बोली चिंता न करें मेरे पास काफी आभूषण है उनसे सब ठीक हो जायेगा l 

प्रकाश के पिता दिन प्रतिदिन टूटते चले गए काफी बिमारियों ने जगड लिया! अंत में वह यह दर्द सहन नहीं कर पाये और चिर विराम निंद्रा में सो गए l 
घर समस्याओं में घिर गया तभी प्रकाश को अनुकम्पा नौकरी मिली l वह पढ़ाई व नौकरी दोनों कर रहा था, कानपुर में ही किराये के मकान में रहते थे l 

ऊषा जैसे ही घर आई माँ से पूछा माँ भईया नहीं आये? 
माँ बोली कुछ देर पहले आया है, थका है सो ऊपर अपने कमरे में चला गया है l  आराम कर रहा होगा! अब तू आ गई तो बुलाती हूँ अब सब साथ भोजन करेंगे l
 
आज से उसकी परीक्षा भी समाप्त हो गई, अब शांति पूर्वक खाना खायेगा माँ क्या पता की असली बात क्या है l 

ऊषा ने सोचा “काश पिता जी इनकम टैक्स भर रहे होते “
तो आज यह दिन न देखना पड़ता l  माँ पिताजी की मृत्यु के बाद काफी टूट गई है! इस घटना का उन पर क्या प्रभाव पड़ेगा l 
ऊषा भी ११ वीं कक्षा की छात्रा है सब समझती है सोचने लगी क्या करूँ ?
उसने काफी हिम्मत कर भाई को आवाज़ लगाई भईया जल्दी नीचे आओ देखो माँ को क्या हो गया, यह सुनते ही प्रकाश हड़बड़ा कर नीचे उतर आया l 
माँ, बेटी हॅंस पड़ी चल भूख लगी है खाना खाते हैं  ऊषा की तो आदत है मजाक करने की फिर आज तू भी बेफिक्र हो गया माँ बोली l 

सब खाना खाने लगे माँ से छिपा कर “भाई बहन एक दूसरे को देख लेते हैं” जैसे सच बात जानते हो? 
माँ कुछ लेने गई तो ऊषा ने कहा भईया तुम्हारी नौकरी की बात प्रो. साहब से मुझे मालूम हो गई है पर माँ को कुछ पता नहीं है।

प्रकाश बोला की कभी न कभी तो पता चलेगा ही? 
माँ तो बहुत हिम्मत वाली है ! वही कोई न कोई रास्ता निकालेगी उसे बताना ठीक रहेगा दोनों ने ही माँ को सारी सच्चाई बता दी। 
थोड़ी देर माँ असहज लगी फिर बोली अपने गांव चलो फिर वही तेरी दीदी, जीजा से बात करेगें!
 गांव के घर में रहेंगे किराया बचेगा! और जो यहाँ के मकान का किराया बाकी है, सो जरुरी सामान ले चलूँगी बाकी मकान मालिक को किराये के बदले दे देंगे l
 “दोनों भाई, बहिन माँ को देख हैरान” पिताजी की चीजों से प्यार करने वाली के मन में यहभाव कैसे आया? 
वह पति के साथ बिताये दिन की यादें मन में दबाये गांव आ गई!पुस्तैनी मकान में अपने हिस्से में रहने लगी l 

प्रकाश को इलाहाबाद में प्राइवेट कम्पनी में नौकरी लग गई l कुछ दिनों ठीक चला एकाएक माँ की तबियत बिगड़ गई वह ब्लड प्रेशर की मरीज थी पर “बच्चों को दुःख न हो उनके सामने कठोर चट्टान बनी रहती थी “
अन्दर तो एक कैक्टस का पौधा उगा ही हुआ था l एक दिन ब्रेन हैमरेज हो गया वह भी चल बसी l 

  प्रकाश को लगा की जीवन में तो संघर्षोका जंगल बन गया बहिन की जिम्मेदारी घर में अकेले छोड़ कर नौकरी पर जाना ठीक नहीं ।
क्या करे बहन तो मानो बोलना ही भूल गई गुम सूम रहने लगी प्रकाश को लगा कि आगे कैसे पढ़ पायेगी, गांव इलाहाबाद से ४० किलोमीटर की दूरी पर था प्रकाश बस से आता जाता था l 
उसने सोचा उषा को बड़ी बहन के पास छोड़ देना चाहिए उसने बहन के पास उषा को छोड़ दिया। 
और उसकी शादी के लिए वर की तलाश शुरू कर दी!उसे एक अच्छे परिवार का शिक्षक लड़का मिला और बहन की शादी 
की तैयारी करने में अपने आप को दिन रात मेहनत के हवाले कर दिया वह चाहता था।
  कि बहन की शादी में किसी तरह की कोई कमी ना हो !ओवर टाइम कर पैसा इकट्ठा किया और माँ के जेवर बेच कर बहन की शादी कर दी और वह अपने घर में सुखी हो गई।

अब प्रकाश अपने को बहुत अकेला महसूस करने लगा!माँ के जाने के बाद उस को बहन के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करना था दोनों भाई बहन में अटूट प्रेम था उसे हमेशा अपनी बहन की खुशी की चिंता रहती थी उसके जाने के बाद अंदर ही अंदर अपने आप को अकेला महसूस करने लगा था।

उसको अपने बचपन की यादें माता-पिता के साथ गुजारा समय बहन के साथ लड़ना झगड़ना जब ऊषा उससे कहती थी देखना भैया मेरी शादी के बाद आप अकेले हो जाओगे तब किस झगड़ा करोगे? 
आज सच में उसके सामने सारी बातें चल चित्र की तरह चलने लगी।
वह सोचने लगा अब मुझे किस केलिए जीना है! दोनों बहने अब अपने अपने घर संसार में अपने कर्तव्य निभा रही है मेरे पास अब क्या बचा है? 
अब तो अपना जीवन बोझ सा महसूस कर रहा हूं प्यार से दो शब्द बोलने वाला भी तो मेरे पास कोई नहीं है मेरी परेशानी में मेरे सिर पर हाथ रखने वाला भी तो कोई नहीं है लगता है अब तो मेरा जीवन व्यर्थ है। 
जीवन मे कैसी-कैसी  परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है।वह सोचने लगा क्या अभी भी मेरे जीवन में कोई और कठिन परीक्षा बाकी रह गयी है।
” हे भगवान अब आप ही मुझे कोई राह दिखाओ”
वह सोच सोच कर परेशान हो गया क्या करूं क्या ना करूं अब तो मेरे जीवन का क्या महत्व है?
 पिता की मृत्यु के बाद मैंने अपनी जिम्मेदारियां पूरी तरह से निभाई है!
अब तो लगता है कि ऐसी  जगह चला जाऊं जहां मुझे दो पल की शांति मिले।



प्रकाश एकदम अकेला माँ, बाप की कोई निशानी नहीं बची बहन की शादी में सब बेच बाचकर शादी कर दी ! निराशा से जीवन भर गया l 

प्रकाश के दोस्तों ने प्रकाश को घेरना शुरू कर दिया! उसे लगा अब इन्हीं के संग जीवन का गम दूर करूँ l 
वह राह से भटकने लगा, “माँ, बाप का इकलौता बेटा बचपन आनन्द मय बीता उसकी हर इच्छा माँ, बाप पूरी करते थे” वह अतीत को याद कर बेचैन हो जाता, उस के दोस्त स्वार्थी प्रकृति के थे उसके पैसे पर ऐश करते उसे उनके साथ अच्छा लगने लगा l 

सच्चा दोस्त मिल जाये तो जीवन भटकने से बच जाता है, उसका एक दोस्त मुसलमान था काज़िम !वह नेक दिल सही सलाह देने वाला उसने समझाया की तुम औरों की बातों में आकर भटकने लगे हो, तुम्हारा अभी सारा जीवन बाकी है।
 जीवन के अतीत को भूल जाओ अपने वर्तमान को खराब मत करो भविष्य के बारे में सोचो l 

प्रकाश बोला अब जीवन में बचा ही क्या है? 
सब तो समाप्त हो गया मेरा, बहने अपने घरों में सुखी हैं बस हाल चाल पूछ लेती हैं। 

काज़िम बोला देखों मैं दीदी को तुम्हारी शादी के बारे में बोलता हूँ !शादी हो जायेगी सच्चा जीवन साथी मिल गया तो बाकि जीवन शांति से कट जायेगा जो लिखा था हो चुका अब आगे अच्छा ही होगा l
काज़िम ने दीदी से बात की, काजिम की
राय दीदी को पसंद आई और उन्होंने उसके लिए लड़की ढूँढनी शुरू की! लखनऊ में मध्यम परिवार की लड़की पसंद आई वह परिवार भी इसी प्रकार की मुसीबतों का मारा था, लड़की भी टीचर की नौकरी कर रही थी, माँ, छोटा भाई परिवार में थे, पिता की मृत्यु हो चुकी थी।
 दीदी ने कहा ऐसी लड़की ही सही परिवार चलाएगी।
 “क्योकि वह भी दर्द को समझती है” प्रकाश का विवाह उसके साथ हो गया l 

दोनों इलाहाबाद में किराए का मकान लेकर रहने लगे! बहनों को भी मायके का दरवाजा मिला l प्रकाश को जीवन में सुकून मिलने लगा, उसके दो बेटे हुए उनको पढा लिखा कर शादी ब्याह कर वह भी ऊँचे-ऊँचे ओहदो में कार्यरत हो गये l 

माँ उन्हें पिता के जीवन के बारे में बताती थी कि किन कठिनाईओं में उनका जीवन बीता है तुम लोग उनकी वेदना को समझो! पर बच्चों को माँ, बाप का भरपूर साथ मिला तो वह यह बात समझ नहीं पाते थे अपने जीवन में मस्त थे l 

कभी मिलने आ गये कभी पैसे भेज दिये यही उन्होंने अपने फर्ज समझा।
 कभी पिता के साथ सहानुभूति से बात नहीं की?
प्रकाश के मन में कैक्टस चुभते ही रहे! और एक दिन चिर विराम  मुक्ति  उन्हें मिल गई संसार से अलविदा कह गये l 

प्रकाश की पत्नी जीवन के अंतिम पड़ाव में बच्चों के साथ समझौता का जीवन जी रही थी ! उन्होंने सोचा परिस्थितियों से समझौता करना ही जीवन को सही राह दिखा सकता है ।
और वह समाज सेविका का कार्य करने लगी उन्हें अपने जीवन में एक नई पहचान मिल गई उससे उनके मन को शांति मिली।
 पति को बहुत समझाती थी , जो बीत गया है उसको याद रखने से मन ज्यादा दुखी होता है हमें अब अपने वर्तमान को संभालना है! परंतु वह अपने मन को पत्नी की तरह परिवर्तित नहीं कर पाए और अतीत की यादें के साथ संसार से चले गए।।
  

शीला श्रीवास्तव 
 भोपाल


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