अनकहे रिश्ते'-अनिल पुरोहित

रीना ने लैपटॉप बंद किया तो घड़ी रात के ग्यारह बजा चुकी थी। कमरे में एसी की ठंडी हवा थी, लेकिन भीतर कहीं गर्मी उठ रही थी। बाहर सड़कें खाली थीं, बस कभी-कभी किसी कैब की लाइट बालकनी से गुजर जाती।

वह उठकर किचन में गई। सिंक में बचे दो बर्तनों पर जमी हल्की चिकनाई जैसे पूरे दिन की थकान का प्रतीक थी। उसने उन्हें बिना मन से धोया, फिर खुद को देखा –  चमकदार ऑफिस की पहचान वाला चेहरा, पर आंखों में सूनापन झलक रहा था।

अमित दूसरे कमरे में था। टीवी पर न्यूज चल रही थी, आवाज़ ऊँची थी। वह मोबाइल पर किसी व्हाट्सएप ग्रुप में हंसते हुए इमोजी भेज रहा था।

रीना ने दरवाज़े से झाँककर देखा। मन हुआ कुछ कहे, पर आवाज़ हलक में ही अटक कर रह गई।

“खाना फ्रिज में रख दिया है,” उसने बस इतना कहा।

अमित ने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, “ठीक है, मैं खा लूंगा।”

बस इतना ही संवाद था आज पूरे दिन का।

सान्या अपने कमरे में थी, टैबलेट पर वीडियो देख रही थी। रीना पास गई तो उसने तुरंत हेडफोन उतारे, बोली, “मम्मा, कल स्कूल में डांस प्रैक्टिस है, ड्रेस प्रेस कर देना।”

“हाँ, सुबह कर दूँगी।”

सान्या मुस्कराई नहीं, बस सिर झुकाकर स्क्रीन पर लौट गई।

रीना लौटकर बालकनी में खड़ी हुई। नीचे फैले शहर की रोशनी झिलमिला रही थी। हर घर जगमग था, पर न जाने क्यों हर रोशनी के पीछे उसे एक अंधेरा महसूस होता था।

कभी इस शहर ने उसे आज़ादी दी थी, अपने पैरों पर खड़े होने का गर्व दिया था। अब वही शहर उसे घेरता लगता था – जैसे भीड़ में अकेलापन चीख रहा हो।

फोन टेबल पर रखा था। स्क्रीन पर फेसबुक नोटिफिकेशन चमक रहा था –  “समवन फ्रॉम योर पास्ट कमेंटेड ऑन योर ओल्ड फोटो।”

उसने खोला तो कॉलेज के दिनों की तस्वीर थी –  जहां वह और आदित्य साथ खड़े थे, हँसते हुए, बेफिक्र।

दिल ने हल्की सी धड़कन ली, जैसे किसी पुराने दरवाज़े के पीछे से कोई आवाज़ आई हो।

कभी अमित के साथ भी ऐसे ही हँसी थी। उस समय लगता था कि यह रिश्ता उम्रभर साथ चलेगा। अब लगता था, शायद वह रिश्ता किसी बंद लिफ़ाफ़े की तरह है –  जो भेजा तो गया, पर पहुंचा नहीं।

रीना ने अपने आप से पूछा, “क्या बस इतना ही होता है हर शादी का अंजाम? दो लोग, जो एक-दूसरे से कभी कुछ भी नहीं छिपा सकते थे, अब महीनों तक बात भी नहीं करते?”

रात गहराने लगी थी। अमित ने टीवी बंद किया और बिना कुछ बोले कमरे में चला गया।

रीना ने देखा –  उसकी पीठ पर नज़र डालते हुए मन में एक अजीब खालीपन था। वह चाहती थी कि अमित एक बार पीछे मुड़कर देखे, कुछ कहे, बस इतना भर कि "कैसी हो?"

पर दरवाज़ा बंद हो गया।

कमरे में लौटकर रीना ने लाइट बंद की। खिड़की से आती हल्की नीली रोशनी में उसे लगा जैसे दीवारों में दरारें हैं –  दिखती नहीं, पर हर दिन बढ़ती जा रही हैं। उसने आँखें मूँदीं, पर नींद नहीं आई। बस एक सवाल भीतर गूंजता रहा –  “क्या वाकई मेरा अब भी किसी के लिए कोई महत्त्व है?”

ऑफिस का दिन खत्म होते ही रीना ने कार पार्किंग से निकाली। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। वाइपर लय में चल रहे थे, पर भीतर कुछ गड़बड़ था –  जैसे दिल में कोई पुराना संगीत अचानक बज उठा हो। फोन पर एक संदेश आया – “रीना, याद है? कॉलेज का वो कॉफी हाउस? आज उधर से गुज़रा। अगर समय हो तो मिल सकते हैं।”

नीचे नाम था –  आदित्य मेहता।

कुछ पल के लिए रीना जैसे ठिठक गई। पंद्रह साल पहले आख़िरी बार देखा था उसे। उस समय दोनों के रास्ते अलग हो गए थे। आदित्य हमेशा कहता था – “रीना, कुछ रिश्ते वक्त नहीं, समझ से टिकते हैं।”

वह तब मुस्करा दी थी, पर अब वो पंक्ति जैसे सच बनकर लौट आई थी।

वह सीधा उस कॉफी हाउस पहुँची। वही पुरानी जगह, बस अब वहां दीवारों पर रेट्रो लाइटें लटक रही थीं।

आदित्य खिड़की के पास बैठा था। बालों में हल्की सफेदी, चेहरे पर वैसी ही शांति।

रीना को देखते ही उठ खड़ा हुआ, मुस्कराया – “इतने सालों बाद भी तुम वैसी ही लगती हो।”

रीना ने हँसते हुए कहा, “साल बीतते हैं, चेहरा नहीं, नज़रें बदल जाती हैं।”

दोनों बैठे। कॉफी की महक ने जैसे बीते सालों की दूरी पिघला दी। रीना ने धीरे से पूछा, “कहाँ थे इतने साल?”

“लिखता रहा, घूमता रहा, लोगों को समझने की कोशिश करता रहा। पर कुछ बातें कभी समझ नहीं आईं... जैसे किसी अपने से बिछड़ने की वजह।”

रीना ने कप में चम्मच हिलाई। वह कुछ कहना चाहती थी, पर बोली नहीं।

आदित्य ने विषय बदला, “तुम खुश हो, रीना?”

प्रश्न सीधा था, पर जवाब कहीं नहीं था। वह कुछ सेकंड चुप रही, फिर बोली, “हाँ, सब ठीक है।”

आदित्य मुस्कराया, “तुम्हारी आँखें ठीक नहीं कहतीं।”

कॉफी ठंडी हो चुकी थी। बाहर बारिश तेज़ हो गई थी।

रीना ने खिड़की से बाहर देखा। सड़क की भीगी लाइटों में जैसे उसे अपनी ही ज़िंदगी दिख रही थी –  चमकती हुई, पर भीतर से गीली और टूटी हुई।

दोनों देर तक बातें करते रहे। बचपन, कॉलेज, सपने, किताबें, यात्रा –  हर विषय पर। फिर एक लंबा मौन आया। आदित्य ने कहा, “तुम्हारे भीतर का मन कुछ बोलना चाहता है, बस तुम उसे सुन नहीं पा रहीं।”

रीना ने देखा, उसकी आँखों में कोई जजमेंट नहीं था –  बस समझ थी।

वह बहुत दिनों बाद किसी से ऐसे मिली थी, जो बिना कुछ कहे उसे समझ रहा था।

विदा लेते समय आदित्य ने कहा, “कभी वक्त मिले तो ऋषिकेश आना। वहीं लिखता हूँ इन दिनों। गंगा के किनारे। वहां शब्द भी सच लगते हैं।”

रीना ने बस सिर हिला दिया।

वह कैफ़े से बाहर निकली तो हवा ठंडी थी, पर दिल में कुछ गर्माहट थी। कार की खिड़की से गिरती बारिश की बूंदें जैसे मन के पर्दे पर चिपक गईं। घर लौटते समय उसे पहली बार लगा कि शायद ज़िंदगी अब भी कोई नया अध्याय लिखना चाहती है पर घर की लाइटें देखते ही वह फिर थम गई।

अमित का संदेश आया था – “डिनर कर लिया है। मीटिंग लेट चल रही है।”

वह मुस्कराई नहीं। बस फोन बंद कर दिया। कमरे की खामोशी में उसने खुद से पूछा – “क्या मैं वाकई किसी की पत्नी हूँ, या बस किसी घर की ज़रूरत भर?”

रात के सन्नाटे में जब शहर थक कर सो जाता है, तभी घरों की दीवारें बोलने लगती हैं। रीना के घर में भी वही आवाज़ें थीं –  बस कोई सुनता नहीं था।

कॉफी हाउस की उस मुलाकात के बाद से कुछ बदल गया था। रीना अब पहले जैसी नहीं रही। वह अब ज़रा ज़्यादा मुस्कराने लगी थी, पर उसकी मुस्कान के पीछे एक अजीब सी बेचैनी थी। जैसे उसने किसी बंद दरवाज़े की चाबी पा ली हो, पर अभी दरवाज़ा खोलने का साहस नहीं जुटा पाई हो।

ऑफिस में भी वह पहले से ज़्यादा सक्रिय हो गई थी। सहकर्मी कहते, “मैम, यू आर ग्लोइंग।”

पर उसे खुद पता था –  यह चमक भीतर के अंधेरे से लड़ने की कोशिश है।

अमित अब भी वैसा ही था –  हर बात में जल्दी, हर भावना में दूरी। घर लौटते ही मोबाइल उसके हाथ में आ जाता, सान्या कुछ बताती तो वह आधे मन से सिर हिला देता। रीना ने कई बार सोचा कि उससे बात करे, सब कह दे –  जो वर्षों से भीतर जमा है –  पर हर बार उसके शब्द गले में अटक जाते। उसे लगता, इस रिश्ते में अब कोई “हम” नहीं बचा, बस “मैं” और “तुम” हैं, जो एक ही घर में रहते हैं, पर दो दुनियाओं के निवासी हैं।

एक शाम, जब बारिश के बाद आसमान धुला हुआ था, रीना बालकनी में खड़ी थी। हवा में मिट्टी की खुशबू थी। उसी समय आदित्य का फोन आया।

“क्या कर रही हो?”

“कुछ नहीं, बस यूँ ही... सोच रही थी।”

“कभी खुद के बारे में भी सोचो, रीना। ज़िंदगी दूसरों को खुश रखने में खत्म मत करो।”

उसकी आवाज़ शांत थी, पर असर बहुत गहरा था। रीना देर तक फोन हाथ में लिए बैठी रही। मन के भीतर एक सवाल घूमता रहा –  क्या वाकई वह जी रही है, या बस निभा रही है?

अमित ने उसे चुप देखा तो पूछा, “किसका फोन था?”

“कॉलेज का दोस्त था,” रीना ने सहजता से कहा।

अमित ने बस “हूँ” कहा और फिर अपने लैपटॉप पर झुक गया। उस “हूँ” के पीछे कितनी उपेक्षा, कितनी दूरी थी –  रीना ने महसूस किया। कभी-कभी खामोशी भी चीख बन जाती है।

उस रात, रीना को नींद नहीं आई। वह बिस्तर पर लेटी, छत को ताकती रही। अचानक अमित बोला, “तुम आजकल बहुत बदल गई हो।”

रीना ने धीमे स्वर में पूछा, “कैसे?”

“पहले इतनी बात करती थीं, अब जैसे कोई दीवार खड़ी कर ली हो।”

रीना मुस्कराई –  “दीवार तो बहुत पहले ही खड़ी हो गई थी, अमित। अब बस उसकी परतें दिखने लगी हैं।”

अमित चुप रहा। वह कुछ कहना चाहता था, पर शब्द नहीं मिले। रीना उठी, बालकनी में चली गई। आसमान में आधा चाँद था, अधूरा –  बिल्कुल उसके रिश्ते की तरह।

अगले दिन सुबह सान्या ने कहा, “मम्मा, पापा तो आज भी जल्दी निकल गए।”

रीना ने सिर हिलाया, फिर उससे कहा, “बेटा, अगर कभी कुछ अधूरा लगे, तो किसी से कहने से मत डरना।”

सान्या ने मासूमियत से पूछा, “आप अधूरी हैं क्या?”

रीना ने उसकी आँखों में देखा, और कुछ कह नहीं पाई।

शाम को जब अमित लौटा तो घर में अजीब सी शांति थी।

टेबल पर खाना रखा था, पर रीना नहीं थी। फोन उठाया, रीना का संदेश था – “कुछ दिनों के लिए बाहर जा रही हूँ, अपने लिए। सान्या माँ के पास है। चिंता मत करना।”

अमित ने संदेश पढ़ा और काफ़ी देर तक स्क्रीन देखता रहा। पहली बार उसे लगा कि यह खामोशी डरावनी है।

पहली बार उसे महसूस हुआ कि घर सचमुच खाली है।

रीना उस समय ट्रेन में थी। खिड़की से पीछे भागता शहर देख रही थी –  वही शहर जिसने उसे बाँधा भी था, और आज़ाद भी किया था। ट्रेन के शोर के बीच उसे अपने भीतर एक धीमी आवाज़ सुनाई दी – वही दरकन, जो वर्षों से दबा दी गई थी, अब पूरी ताक़त से बोल रही थी।

वह जानती थी, अब लौटकर कुछ वैसा नहीं रहेगा जैसा पहले था। पर वह यह भी जानती थी –  अगर अब कुछ नहीं कर पाई, तो भीतर से हमेशा के लिए मर जाएगी।

उसने गहरी साँस ली, और पहली बार मुस्कराई –  सच्ची, निडर मुस्कान। एकतरफ रिश्ते टूट रहे थे, पर वह खुद से जुड़ रही थी।

ऋषिकेश की सुबह हमेशा अलग होती है। सूरज जैसे धीरे-धीरे गंगा के जल में उतरता है, और उसकी किरणें लहरों पर सुनहरी लकीरें खींचती हैं। हवा में अगरबत्ती की सुगंध और मंत्रों की धीमी गूंज होती है –  और उस गूंज में एक अजीब शांति छिपी होती है।

रीना वहीं बैठी थी –  गंगा किनारे की पत्थर की सीढ़ियों पर, सिर पर दुपट्टा ओढ़े, सामने बहते पानी को देखती हुई। ट्रेन से उतरने के बाद यह उसका तीसरा दिन था।

पहले दो दिन उसने बस चुप्पी ओढ़ ली थी –  न किसी से बात की, न फोन देखा। वह चाहती थी कि भीतर जमा सारे शोर धीरे-धीरे थम जाएँ।

तीसरे दिन, सूर्योदय के साथ जब वह गंगा तट पर पहुँची, तो उसे लगा जैसे यह शहर नहीं, एक दर्पण है –  जिसमें वह पहली बार खुद को साफ़ देख पा रही है।

कई सालों से वह जो थी, वह शायद किसी और की परछाई थी –  पत्नी, माँ, कर्मचारी, किसी की अपेक्षाओं का पात्र। आज वह सिर्फ रीना थी, अपने नाम की, अपनी सोच की। कभी वह सोचती थी कि शादी का मतलब साथ होना है। अब समझ आई कि साथ का अर्थ सिर्फ एक ही छत नहीं होता। अगर दो दिलों के बीच कोई बात, कोई समझ, कोई स्नेह नहीं बचा –  तो साथ रहने का क्या अर्थ?

वह किनारे से गंगा का जल उठाती है, हथेलियों में समेटकर देखती है। पानी की हर बूंद पारदर्शी है, पर उसमें गहराई है। उसे लगता है –  शायद रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। ऊपर से साफ़, भीतर से अनकहे भावों से भरे।

पास ही एक साध्वी बैठी थी, उम्र करीब साठ की। उसने मुस्कराकर पूछा, “बेटी, पहली बार आई हो?”

रीना ने सिर हिलाया, “हाँ, खुद से मिलने।”

साध्वी ने कहा, “फिर ज्यादा वक्त मत लगाना। जब खुद से मिल जाओ, तो लौट जाना। जो लोग तुम्हारे लौटने का इंतज़ार करेंगे, उन्हें भी शायद तब पहली बार तुम सच में दिखोगी।”

रीना चुप रही। उसके शब्दों ने जैसे भीतर कहीं एक गूंज छोड़ दी।

शाम को वह घाट की सीढ़ियों से उतरकर छोटी नाव में बैठी। गंगा का प्रवाह जैसे उसके भीतर के बोझ को बहा रहा था।

नाविक ने पूछा, “दीपक बहाना है क्या?”

रीना ने दीपक लिया, उसमें जलती बाती रखी, और पानी में छोड़ दिया। दीपक धीरे-धीरे बहता चला गया। वह देखती रही –  रोशनी छोटी होती गई, फिर पानी में समा गई। उसे लगा, शायद यही जीवन का अर्थ है –  छोड़ देना, जो अब अपना नहीं रहा।

रात में वह कमरे में लौटी, खिड़की से बाहर देखा। सामने पहाड़ों की परछाइयाँ थीं, और दूर कहीं मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं। उसने फोन उठाया। अमित का नंबर स्क्रीन पर दिखा, पर उसने कॉलबैक नहीं किया।

इसके बजाय उसने एक संदेश टाइप किया – “मैं ठीक हूँ। कुछ दिनों में लौटूँगी। शायद तब पहली बार हम सच में बात कर पाएँगे।”

संदेश भेजकर उसने आँखें बंद कीं। नींद आई –  गहरी, शांत, वर्षों बाद की पहली सच्ची नींद।

अगली सुबह सूरज की किरणें उसके चेहरे पर पड़ीं।

उसने अपने आप से कहा, “शायद यह अंत नहीं, शुरुआत है।”

गंगा की लहरें किनारे से टकराईं, जैसे सहमति में सिर हिला रही हों।

“कुछ रिश्ते टूटते नहीं, बस अपने रूप बदल लेते हैं।

कभी दूरी में भी अपनापन होता है, और कभी साथ रहते हुए भी खालीपन। रीना ने उस दिन समझा –  जीवन का सबसे बड़ा रिश्ता, खुद से निभाना होता है।”

   - गांधी मार्ग, सांड चौक, सुजानगढ़ (चूरू) राज.

मेल : anilpurohit123@gmail.com

अनिल पुरोहित

सांड चौक,भोजलाई बास, सुजानगढ़ -331507 (राज.)

मो. 9828547841



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