सुनो
वो सब तुम
जो मैंने कभी नहीं कहा
कि मन
करता ही रहा
हरदम तुमसे
एकांत में
मन की बात,,
यूँ भी
मेरा मन
नहीं है पत्थर
तुमसा
कोशिश की
मैंने भी तो
कई कई बार
बन जाऊँ
अहिल्या
मगर फिर सोचा
कि हर अहिल्या को
राम नहीं मिलते
और
जो होते तुम राम
तो क्यों बनती मैं पाषाण
प्रस्फुटित होते तब
मुझमें भी वो सारे स्वप्न
जो तुम्हारी आँखों ने
बोए थे कभी
मेरी आँखों में
सुनते
काश!कभी तुम भी तो
अपने मन की बात,,,
मेरे मन की बात,,,
शुचि 'भवि'
भिलाई
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