नीरज आज फिर बहुत उदास था और अपनी यादों के समुन्दर में गोते खाता भविष्य को तैरने की तैयारी कर रहा था।विवाह के 30 वर्ष तो काम- काज, लालन-पालन में बीत ही गये थे।अचानक ईश्वर को क्या सूझी थी उसके मन की शांत झील में कंकड़ी फेंकने की।यही सोच विचार में मग्न उसे पता ही नहीं चला कि कब उसका गंतव्य आ गया और वह बस से उतर गया।आज दो वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद वो वापस लौटा था।आंगनवाड़ी वहीं थी जहाँ पहले हुआ करती थी और उसे विश्वास था कि रचना भी वहीं मिलेगी उसे। शाम सिंदूरी हो चली थी।दरवाज़े की सांकल खटखटाने जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया, दरवाज़ा खोल रचना सामने खड़ी मिली। झुककर उसके पाँव छू लिए थे रचना ने। उसने पूछा भी, ये क्या रही हो रचना? मद्धम मुस्कुराहट से रचना ने जवाब दिया, अपने विश्वास की जीत का अभिनंदन कर रही हूँ।तुम बिल्कुल नहीं बदली। आज भी तुम्हें मुझसे कोई नाराज़गी, कोई प्रश्न नहीं है।कैसे रह लेती हो तुम इतना सरल?
बहुत आसान है नीरज, मैंने विश्वासघात नहीं किया ख़ुद से कभी।क्या हुआ जो जीवन के एक पड़ाव में मेरे मन में तुम्हारे आगमन से हलचल हुई?अपनी जवानी के दिनों में मैं आकृष्ट नहीं हुई तो ये ज़रूरी नहीं कि कभी भी नहीं होना चाहिए।मन और दिमाग़ मेरे भी लड़े थे उस रोज़ जब तुमने प्रथम बार कहा था कि मैं तुम्हें पहले क्यों नहीं मिली?मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारे लिए ही बनी हूँ।तुमने मुझे अपनी पत्नी, बच्चों के विषय में बताते हुए आमंत्रित किया था अपने जीवन में।
उस लड़ाई में मेरा मन विजयी हुआ और हमारी मुलाक़ातें हुईं।मैंने इस बदलाव को स्वीकार किया मगर इस चुनौती के साथ कि मेरा कोई परिवार नहीं है, इसलिए मेरी प्राथमिकता तुम्हारे परिवार का मान-सम्मान है और मैंने स्वयं ही ख़ुद को अनगिनत बंधनों में बांध कर तुम्हें अर्पित किया।
अचानक फिर तुम बदल गए। ख़ुद से विश्वासघात करने लगे।तुम्हें लगा ये जो हुआ नहीं होना चाहिए था और ख़ुद को बिना कुछ कहे अचानक ही मुझसे दूर कर लिया।मैंने भी बस अपने विश्वास को तुममें ज़िंदा रखा और कभी भी ख़ुद से विश्वासघात नहीं किया।आज आपने यहाँ आकर ख़ुद ये प्रमाणित किया है कि सबसे अधिक दुखदाई स्वयं की पवित्र भावनाओं से विश्वासघात होता है।
शुचि 'भवि'
भिलाई,छत्तीसगढ़
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