रचनाकार संख्या - 82
अस्माकं देशे सर्वासु नदीषु गंगा अति श्रेष्ठा प्रधाना पवित्रतमा च वर्तते । इयम् हिमालयात् नि: सृत्य बंगोपसागरे पतति ।अस्या पावन तटे विशाला: प्राचीना: निगर्य: स्थिता: सन्ति, यथा ऋषिकेश: हरिद्वार: प्रयाग: वाराणसी,पाटलिपुत्रादि ।अस्माकं सभ्यता संस्कृति एषु नगरेषु उन्नता जाता। गंगा एव भारतवर्षस्य धार्मिक विचारधाराया: पारिचायिका अस्ति।चिरकाल_रक्षितेsपि गंगाजले कीटाणव: प्रभवन्ति।अतएव गंगानदी नित्या पूजनीय, वंदनीया सेवनीया च । भारतीया: जना: गंगाया: जलस्य मात्र सेवनं न कुर्वन्ति अपितु देववत् पूजयन्ति च ।गंगास्मरणमात्रेण पाप: शिर: धुनोति इति कथ्यते।
पतितोद्धारिणि जाह्नवि गंगे खण्डित गिरिवरमण्डित भंगे।
भीष्म जननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्ये।।
अर्थात्_हमारे देश के सभी नदियों में गंगा श्रेष्ठ प्राचीन और पवित्र है यह हिमालय से निकल कर बंगोपसागर मैं गिरती है। इसके पावन तट पर अनेक प्राचीन नगर बसे हुए हैं जैसे ऋषिकेश हरिद्वार, प्रयाग वाराणसी पाटलिपुत्र जिसे पटना कहते हैं। हम लोगों की सभ्यता और संस्कृति इसी नगरों से उत्पन्न हुए हैं। गंगा भारतवर्ष के धार्मिक विचारों का परिचायक है। बहुत दिनों तक रखने पर भी गंगाजल में कीटाणु नहीं होते हैं। अतः इसलिए गंगा नदी प्रतिदिन पूजनीय, वंदनीय एवं सेवनीय है। भारत के लोग गंगाजल का सिर्फ सेवन ही नहीं करते बल्कि देवताओं के समान पूछते भी हैं। गंगा के स्मरण मात्र से पाप शिर से मिट जाते हैं ऐसा कहां जाता है।
कि हे पतित जनों का उद्धार करने वाली गंगे तुम्हारी तरंगे गिरिराज हिमालय को खंडित करके बहती हुई सुशोभित होती हैं, तुम भीष्म की जननी और जह्नुमुनि की कन्या हो, पतित पावनी होने के कारण तुम त्रिभुवन में धन्य हो। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं।।
आचार्य पंडित सच्चिदानंद लसियाल
ऋषिकेश उत्तराखंड हिमालय
संपर्क सूत्र_9411345941
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