अखंड गहमरी का यात्रा-वृत्तांत मन का मुसाफ़िर :पुस्तक चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव

  पुस्तक चर्चा

मन का मुसाफ़िर : यात्रा-वृत्तांत

लेखक : अखंड गहमरी

पुस्तक चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव

यात्रा-वृत्तांतों की भी अपनी दुनिया है। कुछ लोग यात्रा पर जाते हैं तो लौटकर बताते हैं , कहाँ-कहाँ घूमे, क्या-क्या खाया और होटल कैसा था; कुछ लोग लौटकर बताते हैं कि वहाँ की संस्कृति कैसी थी, लोग कैसे थे और प्रकृति ने उनसे क्या कहा। अखंड गहमरी की पुस्तक ‘मन का मुसाफ़िर’ दूसरी श्रेणी की यात्रा है , हालाँकि इसमें पेट और पैर दोनों को पर्याप्त काम मिला है, पर असली यात्रा मन की हुई है।

प्रारंभिक पृष्ठों से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह पुस्तक केवल पर्यटन विभाग की संभावित प्रचार-पुस्तिका नहीं है कि “यहाँ आइए, इतना सुंदर दृश्य देखिए और सेल्फी लेकर लौट जाइए।” गहमरी जी यात्रा को जीवन को समझने का माध्यम बनाते हैं। उनके लिए रास्ता केवल मंजिल तक पहुँचने का साधन नहीं, अपने आप में एक कहानी है; पहाड़ केवल पहाड़ नहीं, प्रकृति की खड़ी हुई कविता हैं; और स्थानीय लोग केवल ‘स्थानीय लोग’ नहीं, अपने अनुभवों और जीवन-मूल्यों के साथ पूरी संस्कृति के प्रतिनिधि हैं।पुस्तक के अध्यायों में विभिन्न स्थलों, प्रसंगों और अनुभवों की जो यात्रा सामने आती है, उसमें पाठक धीरे-धीरे पर्यटक से सहयात्री बन जाता है। फर्क इतना है कि लेखक यात्रा कर रहा होता है और पाठक आराम से कुर्सी पर बैठकर यात्रा कर रहा होता है, न टिकट का खर्च, न सामान उठाने की चिंता, न रास्ते में ट्रेन छूटने का डर! साहित्य की यही तो सुविधा है कि लेखक पसीना बहाता है और पाठक अनुभव बटोर लेता है।

गहमरी जी की प्रकृति-दृष्टि इस पुस्तक की बड़ी विशेषता है। वे प्रकृति को केवल ‘सुंदर’ कहकर आगे नहीं बढ़ जाते। पर्वत, मार्ग, हरियाली, आकाश और वातावरण, इन सबके पीछे छिपे जीवन को देखने की कोशिश करते हैं। उनके लिए प्रकृति पर्यटन का पोस्टकार्ड नहीं, मन का आईना है। वे मानो कह रहे हों कि प्रकृति के पास कुछ देर बैठ जाइए; संभव है मोबाइल का नेटवर्क न मिले, लेकिन अपने भीतर का नेटवर्क जरूर मिल जाए।उनका कथन—“यात्राएँ मनुष्य को केवल नए स्थानों से नहीं, नए अनुभवों से भी परिचित कराती हैं।”, पूरी पुस्तक की मूल चेतना को व्यक्त करता है। सच भी है। घर से निकलते समय हम सोचते हैं कि हम दुनिया देखने जा रहे हैं, लेकिन लौटते समय पता चलता है कि दुनिया ने हमें थोड़ा-सा बदल दिया है। यात्रा हमारे नक्शे में जगहें ही नहीं, दृष्टि में भी विस्तार जोड़ती है।

इसी तरह लेखक का यह विचार, “प्रकृति के निकट पहुँचकर मनुष्य अपने भीतर की शांति को पहचानने लगता है।”,पुस्तक की प्रकृति-दृष्टि को समझने की कुंजी है। आधुनिक मनुष्य शांति खोजने के लिए कभी ‘मेडिटेशन ऐप’ डाउनलोड करता है, कभी वीकेंड पैकेज बुक करता है; गहमरी जी प्रकृति के पास जाने की सलाह देते हैं। वहाँ कोई पासवर्ड नहीं चाहिए, बस मन थोड़ा खाली चाहिए।‘मन का मुसाफ़िर’ की एक महत्त्वपूर्ण खूबी यह भी है कि लेखक स्थानीय संस्कृति और लोकजीवन को बाहर खड़े पर्यटक की निगाह से नहीं देखते। वहाँ के लोग, उनकी जीवनशैली, परम्पराएँ, व्यवहार और मानवीय संबंध उनके वर्णन में आत्मीयता के साथ आते हैं। इसीलिए पुस्तक स्थानों की सूची नहीं बनती, बल्कि मनुष्यों की उपस्थिति से जीवंत होती जाती है।

शिल्प की दृष्टि से यह यात्रा-वृत्तांत वर्णन, संस्मरण और आत्मीय संवाद का सुंदर मेल प्रस्तुत करता है। भाषा सहज और प्रवाहपूर्ण है। लेखक अनावश्यक शब्दाडम्बर में पाठक को नहीं फँसाते। यह भी राहत की बात है कि यात्रा-वृत्तांत पढ़ते समय पाठक को शब्दकोश लेकर बैठने की आवश्यकता नहीं पड़ती। गहमरी जी की भाषा रास्ते की तरह सहज है,चलते जाइए, दृश्य अपने आप खुलते जाते हैं। यह कृति उस व्यापक यात्रा-साहित्यिक परम्परा की याद दिलाती है जिसमें राहुल सांकृत्यायन ने यात्रा को ज्ञान, संस्कृति और जीवन-दृष्टि की खोज से जोड़ा। ‘मन का मुसाफ़िर’ उसी परम्परा को अपने समय और अनुभवों के साथ आगे बढ़ाती हुई दिखाई देती है। अंतर इतना है कि आज का मुसाफ़िर जेब में नक्शे के साथ मोबाइल भी रखता है, लेकिन अंततः उसे रास्ता वही मिलता है जो अनुभव से मिलता है।

समग्रतः ‘मन का मुसाफ़िर’ केवल घूमे हुए स्थानों का विवरण नहीं, बल्कि यात्रा के बहाने प्रकृति, संस्कृति, लोकजीवन और मनुष्य को समझने की संवेदनशील कोशिश है। गहमरी जी की सहज, आत्मीय और दृश्यात्मक भाषा पाठक को पर्यटक नहीं, सहयात्री बना देती है। इस पुस्तक में बाहर की दुनिया के साथ भीतर की यात्रा भी चलती रहती है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है,मुसाफ़िर कदमों से जितना चलता है, मन से उससे कहीं अधिक।और अच्छी बात यह है कि इस यात्रा के लिए न टिकट चाहिए, न सामान पैक करना पड़ता है, बस किताब खोलिए और लेखक के साथ निकल पड़िए।






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