मानवता की अंतिम विजय


सालों से दो देशों के बीच युद्ध चल रहा था। सीमाएँ बारूद की गंध से भरी थीं और धरती सैनिकों के रक्त से लाल हो चुकी थी। दोनों ओर के लोग एक-दूसरे को शत्रु समझते थे। युद्ध ने न केवल शहरों को उजाड़ा था, बल्कि इंसानों के दिलों में भी नफरत के बीज बो दिए थे।

एक दिन भीषण युद्ध के बाद मैदान में चारों ओर घायल सैनिक पड़े थे। गोलियों की आवाज़ थम चुकी थी, पर कराहों का शोर अभी भी हवा में तैर रहा था।

उसी युद्धभूमि के पास एक छोटा-सा गाँव था। वहाँ रहने वाला बारह वर्षीय बालक अर्जुन अपने घर से पानी लेकर लौट रहा था। तभी उसकी नज़र एक वृद्ध घायल सैनिक पर पड़ी। वह सैनिक दुश्मन देश का था। उसके कपड़े फटे हुए थे और होंठ प्यास से सूख चुके थे।

वृद्ध सैनिक ने काँपते हाथों से पानी की ओर इशारा किया। अर्जुन कुछ क्षण के लिए ठिठक गया। उसे बचपन से बताया गया था कि वे लोग शत्रु हैं। लेकिन अगले ही पल उसने सैनिक की आँखों में झाँका। वहाँ कोई दुश्मन नहीं था, केवल एक पीड़ित इंसान था।

अर्जुन उसके पास गया और अपने घड़े से पानी पिलाने लगा। पानी पीते ही वृद्ध सैनिक की आँखों में आँसू भर आए। उसने टूटी-फूटी भाषा में कहा, "बेटा, आज तुमने मुझे याद दिलाया कि इंसानियत की कोई सीमा नहीं होती।"

इतने में दोनों देशों के कुछ सैनिक वहाँ पहुँच गए। उन्होंने देखा कि एक बालक अपने शत्रु सैनिक को पानी पिला रहा है। कुछ सैनिक क्रोधित हुए, पर अर्जुन निर्भय होकर बोला—

"यदि प्यासे को पानी पिलाना अपराध है, तो मैं यह अपराध बार-बार करूँगा। युद्ध नेताओं के निर्णय हो सकते हैं, लेकिन करुणा ईश्वर का आदेश है।"

उसके शब्द सुनकर सभी स्तब्ध रह गए। किसी के पास उत्तर नहीं था।

वृद्ध सैनिक ने काँपती आवाज़ में कहा, "हम सब किसी के बेटे, पिता या भाई हैं। जब गोलियाँ चलती हैं, तो केवल सैनिक नहीं मरते, मानवता भी घायल होती है।"

उस दिन पहली बार दोनों पक्षों के सैनिकों ने अपने हथियार नीचे रख दिए। कुछ ने घायलों को उठाया, कुछ ने पानी बाँटा और कुछ ने अपने शत्रुओं के घावों पर पट्टियाँ बाँधीं।

युद्ध तो उसी दिन समाप्त नहीं हुआ, लेकिन एक नई शुरुआत अवश्य हुई। अर्जुन की करुणा की चर्चा दोनों देशों में फैल गई। लोग समझने लगे कि नफरत से केवल विनाश जन्म लेता है, जबकि प्रेम और मानवता से नई सभ्यताओं का निर्माण होता है।

वर्षों बाद उसी युद्धभूमि पर एक स्मारक बनाया गया। वहाँ किसी सैनिक की प्रतिमा नहीं थी, बल्कि एक छोटे बालक की मूर्ति थी जो एक घायल वृद्ध को पानी पिला रहा था। स्मारक पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा था—

"युद्ध की सबसे बड़ी हार तब होती है, जब मानवता जीत जाती है।"

युद्ध कभी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। यह केवल विनाश, पीड़ा और विभाजन को जन्म देता है। मानवता, करुणा और प्रेम ही वे शक्तियाँ हैं जो संसार को जोड़ सकती हैं। जब हम मनुष्य को उसकी जाति, धर्म, भाषा या देश से ऊपर उठकर देखते हैं, तभी सच्ची सभ्यता का निर्माण होता है।

"जहाँ मानवता जीवित है, वहाँ शांति का सूर्योदय निश्चित है।"

मानवता की छाँव में, मिट जाएँ सब द्वेष।

प्रेम सुधा से सींचकर, जग हो शांति विशेष॥

 शांति सोनी
 बिलासपुर छत्तीसगढ़ 
 मोबाइल नंबर 8770914858



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