कभी-कभी ज़िंदगी के सबसे गहरे दर्द उन शब्दों के पीछे छिपे होते हैं, जो सुनने में सबसे सामान्य लगते हैं— “सब ठीक है।”
यह तीन शब्द अक्सर एक ऐसा पर्दा बन जाते हैं, जिसके पीछे किसी का अकेलापन, संघर्ष और टूटन छिपी होती है।
रोज़ की तरह उस दिन भी मैं सुबह मॉर्निंग वॉक के लिए निकली थी। हल्की ठंडी हवा बह रही थी और सड़क पर इक्का-दुक्का लोग टहलते दिखाई दे रहे थे। वातावरण शांत और सुकून भरा था। चलते-चलते अचानक मेरी नज़र एक जाने-पहचाने चेहरे पर पड़ी।
मैंने दूर से ही आवाज़ लगाई—
“अरे रीता…! यहाँ क्या कर रही हो?”
रीता का बेटा मेरे बेटे के साथ ही पढ़ता था। इसी कारण स्कूल में हमारी मुलाकात हुई थी और धीरे-धीरे वह मुलाकात एक अच्छी दोस्ती में बदल गई थी।
मैंने हमेशा रीता को हँसते-मुस्कुराते, खिलखिलाते हुए ही देखा था। लेकिन उस दिन उसका चेहरा कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। उसकी आँखों में वह चमक नहीं थी, जो हमेशा हुआ करती थी।
थोड़ी देर इधर-उधर की सामान्य बातें करने के बाद मैंने उससे पूछा—
“क्या बात है, आज तुम कुछ उदास लग रही हो?”
उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—
“नहीं… ऐसी कोई बात नहीं, बस यूँ ही।”
मैंने फिर पूछा—
“सब ठीक है… ऑल ओके?”
वह बोली—
“हाँ… हाँ, सब ठीक है।”
इतना कहकर उसने बात जल्दी से समाप्त की और बोली—
“अच्छा, अब चलती हूँ… फिर कभी तुम्हारे घर आऊँगी।”
और वह चली गई।
लेकिन उसके जाने के बाद मेरे मन में एक प्रश्न बार-बार उठता रहा—
क्या सचमुच सब ठीक था…?
हम अक्सर किसी के “सब ठीक है” कह देने पर निश्चिंत हो जाते हैं। हमें लगता है कि सामने वाला व्यक्ति सच में ठीक होगा। लेकिन क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की है कि “सब ठीक है” कहने वाला व्यक्ति वास्तव में कितना ठीक है?
कभी-कभी यह छोटा-सा वाक्य— “सब ठीक है” —अपने भीतर बहुत गहरा दर्द, संघर्ष और अकेलापन छिपाए होता है।
कई लोग भीतर से टूटे हुए होते हैं। वे परेशानियों, तनाव और जिम्मेदारियों के बोझ से दबे होते हैं, लेकिन फिर भी चेहरे पर मुस्कान ओढ़े रहते हैं और दुनिया से कहते हैं—
“सब ठीक है।”
वे अपनी पीड़ा किसी से साझा करने से कतराते हैं। उन्हें डर होता है कि कहीं लोग उनकी कमजोरी का मज़ाक न बना दें या उन्हें कमजोर न समझ लें। इसलिए वे अपने भीतर उठ रहे तूफ़ानों को चुपचाप सहते रहते हैं।
आज के आधुनिक समाज में लोगों के पास समय ही नहीं बचा है। हर व्यक्ति अपनी भागदौड़ में इतना व्यस्त हो चुका है कि उसे यह जानने की फुर्सत ही नहीं कि उसके आसपास रहने वाले लोग किन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं।
पहले लोग एक-दूसरे के घर बैठते थे, बातें करते थे, हाल-चाल पूछते थे। इसी बातचीत में कई दुख हल्के हो जाते थे और कई समस्याओं का समाधान भी निकल आता था।
लेकिन समय के साथ परिस्थितियाँ बदल गई हैं। आज कई बार हमें यह भी पता नहीं होता कि हमारे सामने वाले फ्लैट में कौन रहता है।
निश्चित रूप से किसी के निजी जीवन में अनावश्यक दखल देना उचित नहीं है। लेकिन यदि हमारे आसपास कोई व्यक्ति अचानक बदला हुआ दिखाई दे, उसका व्यवहार पहले जैसा न रहे, तो क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि हम उसके पास जाकर उससे पूछें—
“तुम सच में ठीक हो?”
कभी-कभी किसी व्यक्ति को सबसे अधिक आवश्यकता सिर्फ़ किसी के सहानुभूति भरे शब्दों और थोड़े से समय की होती है।
आज कई बार ऐसा भी होता है कि परिवार के लोग ही अपने ही घर के सदस्यों के मन की स्थिति से अनजान रहते हैं। हम “सब ठीक है” सुनकर आगे बढ़ जाते हैं, जबकि वह व्यक्ति अंदर ही अंदर घुटता रहता है।
कभी-कभी यही घुटन इतनी बढ़ जाती है कि वह हार मान लेता है, और तब हमारे पास केवल पछतावा ही रह जाता है।
तब हम सोचते रह जाते हैं—
काश हमने समय रहते उससे बात की होती…
काश हमने उसके दुख को समझने की कोशिश की होती…
इसलिए आवश्यक है कि हम अपने घर, अपने मोहल्ले और अपने समाज के लोगों के प्रति थोड़ा सजग रहें। उनसे बातचीत करें, उनके संपर्क में रहें और उनके सुख-दुख के सहभागी बनें।
चाहे बच्चे हों या बड़े—हर किसी की अपनी-अपनी परेशानियाँ होती हैं। फर्क बस इतना है कि कुछ लोग उन्हें कह देते हैं और कुछ लोग उन्हें छुपा लेते हैं।
यदि कभी आपके आसपास कोई चेहरा आपको उदास या परेशान दिखाई दे, तो उसके पास जाइए। उससे बात कीजिए और उसे यह एहसास दिलाइए कि वह अकेला नहीं है।
कभी उसका हाथ थामकर बस इतना कह दीजिए—
“अब सब ठीक हो जाएगा।
आप अपना दर्द मुझसे साझा कर सकते हैं।
यदि मैं आपके किसी काम आ सकूँ, तो यह मेरा सौभाग्य होगा।”
विश्वास मानिए, आपका थोड़ा-सा समय, आपकी थोड़ी-सी संवेदना और आपका स्नेह किसी के जीवन में उम्मीद की एक नई रोशनी जगा सकता है।
कभी-कभी किसी की ज़िंदगी बदलने के लिए बहुत बड़ी चीज़ की आवश्यकता नहीं होती—
बस एक सच्चा सवाल, थोड़ा-सा अपनापन और थोड़ी-सी इंसानियत ही काफी होती है।
सोचिए ज़रूर…!!
मधु गुप्ता “अपराजिता”
गाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश)

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