पुरानी पृष्ठभूमि में अगर झाँककर देखा जाय... तो महिलाओं की अलग तस्वीर नज़र आती है, मुग़ल शासन में ज़ुल्म और सितम सहती नारी, सती के नाम पर अग्नि में ज़िंदा झोंक देने वाली नारी, पुरुषों की वासना का शिकार होती देवदासी के रूप में नारी, दासी प्रथा की शिकार नारी, जन्म लेते ही मार दी जाती कन्या, विधवाओ पर होते अत्याचार, घूँघट और दहलीज़ में बँधकर रहने वाली नारी, दहेज की आग में ज़िंदा जलती नारी, बलात्कारियों के हवस में दम तोड़ती नारी,समाज में नारी का यही रूप रहा।आज भी नारी इन सारी परिस्थिति की कहीं न कहीं शिकार है, किंतु यह औसत पहले जैसा भी नहीं रहा।
शिक्षा नवीन विचारो की उत्कृष्टता, से समाज की दिशा भी बदली , स्त्री हर क्षेत्र में अग्रणी हुई, धरती से एवरेस्ट और आसमान को छूने का हुनर सीख गई, शायद ही कोई क्षेत्र स्त्री से अछूता हो, मन की अभिव्यक्ति के साथ सौंदर्य के क्षेत्र में भी अपना नाम दर्ज करवाया, डॉक्टर ,इंजीनियर, उद्यमी,वैज्ञानिक, सेनानी, लेखिका, खिलाड़ी, के अलावा फैशन के क्षेत्र में समूचे विश्व में अपना डंका बजवाया।समाज में महिलाओं की यह बदलती तस्वीर देश के प्रगति की तस्वीर है, माता-पिता को कांधा देकर न केवल पुरातन इतिहास को बदला, बल्कि रूढ़िवादिता के अटूट बंधन से समाज की सोच को बदला।
अब नारी गांधारी की तरह आंखो में पट्टी बांधकर सहयोग नहीं करती, बल्कि असहाय पति -पिता और बच्चों का सशक्त सहारा बनती है।आज के आधुनिक परिवेश में जहाँ महिलायें साहस -दूरदर्शिता,और कर्मठता की मिसाल है, वही दूसरी ओर कुछ महिलायें आज पाश्चात्य संस्कृति की अंधी दौड़ में स्वयं को पतन के गर्त में डुबो रही है।समाज में महिलाओं की यह बदलती तस्वीर निस्संदेह प्रेरणा का प्रतीक है, स्त्री ने अपने सम्मान,और स्वाभिमान की रक्षा कर स्वयं को स्वाबलंबी बनाया, और स्वयं को साबित किया।
डॉ नीरज अग्रवाल नंदिनी
बिलासपुर

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