परीक्षा परिणामों का समय आते ही सोशल मीडिया पर बधाइयों की बाढ़ आ जाती है। जिन बच्चों के अधिक अंक आते हैं, उनके माता-पिता, रिश्तेदार और मित्र गर्व के साथ पोस्ट साझा करते हैं। यह एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है—अपनी खुशी को सबके साथ बांटना। लेकिन इस चमकदार तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
वे बच्चे, जिनके अंक अपेक्षाकृत कम आते हैं, इस माहौल में खुद को पीछे छूटा हुआ महसूस करने लगते हैं। बार-बार दूसरों की सफलता को देखकर उनके मन में हीन भावना, तनाव और कभी-कभी अवसाद जैसी स्थितियां जन्म ले सकती हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या हमारी सोशल मीडिया संस्कृति अनजाने में बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ा रही है?
इस समस्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष हमारी मूल्यांकन प्रणाली भी है। आज परीक्षा की कॉपियां कई शिक्षकों द्वारा जांची जाती हैं और यह कोई रहस्य नहीं कि सभी शिक्षकों का मूल्यांकन दृष्टिकोण एक जैसा नहीं होता। कुछ शिक्षक उदार होते हैं और अधिक अंक देते हैं, जबकि कुछ बहुत सख्त होते हैं। इस असमानता के कारण कई बार अंक किसी छात्र की वास्तविक योग्यता का सटीक प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप, केवल अंकों के आधार पर किसी बच्चे की क्षमता का आकलन करना न केवल गलत है, बल्कि उसके आत्मविश्वास के लिए भी हानिकारक हो सकता है।
ऐसी स्थिति में कुछ लोग यह सुझाव देते हैं कि सोशल मीडिया पर अधिक अंकों की पोस्ट को प्रतिबंधित कर देना चाहिए। हालांकि यह विचार बच्चों की मानसिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से उपजा है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह संभव नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर व्यक्ति का अधिकार है, और खुशी साझा करना मानव स्वभाव का हिस्सा है।
समाधान प्रतिबंध में नहीं, बल्कि सोच और व्यवहार में बदलाव में है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल अंकों के आधार पर न आंकें, बल्कि उनकी मेहनत, ईमानदारी और प्रयास की सराहना करें। माता-पिता और रिश्तेदारों को भी सोशल मीडिया पर पोस्ट करते समय संवेदनशीलता बरतनी चाहिए—ऐसे शब्दों और तुलना से बचना चाहिए जो अन्य बच्चों को आहत कर सकते हैं।
इसके साथ ही, स्कूलों और समाज को मिलकर यह संदेश देना होगा कि सफलता का मापदंड केवल परीक्षा के अंक नहीं हैं। जीवन में कौशल, रचनात्मकता, और आत्मविश्वास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यदि हम बच्चों को यह समझाने में सफल होते हैं, तो वे अस्थायी असफलताओं से टूटने के बजाय उनसे सीखकर आगे बढ़ना सीखेंगे।
अंततः, हमें एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जहां हर बच्चा खुद को मूल्यवान और सक्षम महसूस करे। सोशल मीडिया का उपयोग प्रेरणा देने के लिए होना चाहिए, न कि प्रतिस्पर्धा और दबाव बढ़ाने के लिए। जब हम अपनी सोच में यह बदलाव लाएंगे, तभी हम सच में अपने बच्चों को मानसिक रूप से सशक्त बना पाएंगे।
डाक्टर शीला शर्मा
बिलासपुर
95895 91992
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