जिंदगी एक सफर है सुहाना (मेरी साहित्यिक सफरनामा )
कभी इस विषय पर भी लिखने के लिए भी मेरी लेखनी उठेगी, कभी सोचा नहीं था क्योंकि यह टॉपिक मेरे लिए बिल्कुल अद्भुत और नया था। सफर तो बचपन से आज तक बहुत किये पर आज कुछ अलग हटकर लिखने बैठी हूँ- साहित्यिक सफरनामा!
सफरनामा की बात करें, तो इसकी शुरुआत बचपन से ही हो गई थी। जब भी घर में कुछ अच्छा होता या बुरा होता, माँ की डांट मिलती , भैया का गुस्सा मिलता,सब कुछ एक डायरी में लिखती रहती। रात को सोने से पहले दो घंटे का समय निश्चित था। धीरे-धीरे लेखनी चलती रही और डायरी पर डायरी भरती चली गयी।
जवानी की दहलीज पर कदम भी नहीं रखा था की माँ का साथ छूट गया और मेरी लेखनी ने रफ्तार पकड़ ली।अकेले में रहते हुए माँ के साथ बिताए हुए हर लम्हें को मैं डायरी में लिखती रही और अपने आंसुओं से धोती रही। उनकी यादों को मन मे संजोए धीरे-धीरे मै बड़ी हो गई और मायके की दहलीज पार करके ससुराल पहुँच गई। इकलौती बहू होने के कारण जिम्मेदारियां बहुत थी। उन सब के बीच मेरी लेखनी कहीं गुम हो गई। इस बीच में दो प्यारी प्यारी बेटियों की माँ भी बनी। धीरे-धीरे बच्चे भी बड़े हो गए।
एक दिन अचानक यूँ ही अलमीरा में कपड़ो के बीच दबी मेरी डायरी छोटी बेटी के हाथ लग गई। मेरी डायरी देखते ही बोली, "माँ!तुम तो अच्छा लिखती हो,इसे बंद क्यों कर दिया।" उसके इन्हीं दो शब्दों ने मेरे अंदर एक तरह की उर्जा भर दी और एक बार पुनः लेखन की इच्छा फिर से जाग उठी। उस समय मुझे पता नहीं था कि आगे जाकर यह सफरनामा, साहित्यिक सफरनामा भी बन सकता है। सच पूछिए तो इस सफरनामा की असल शुरुआत तब हुई जब मैं दस साल पहले एक साहित्यिक संस्था' से जुड़ी।
उस दौरान ये भी नहीं पता था कि मेरी लेखनी में कितनी ताकत है। उसी को परखने के लिए मैं अपनी रचनाएं धीरे-धीरे किसी-किसी पत्रिका में भेजने लगी।पत्रिका मे रचनाएं छपती गई और पढ़ने-लिखने का सिलसिला चल पड़ा । तरह-तरह के विषय पर लिखना मेरा शौक बन गया। बहुत साहित्यिक ग्रुप से भी जुड़ने का मौका मिला और उस दौरान बहुत अलग-अलग लेखको की रचनाएं पढ़ने को मिली,सिखने का भी अवसर मिला। तमाम लोगों से जुड़ती चली गई। हर तरह के लोग इस सफर में मिले। कुछ बहुत अच्छे, तो कुछ कम। उनमें कई सहयोग करने वाले भी थे। उन सहयोगियों की मदद से धीरे-धीरे पढ़ने और लिखने की ओर मेरा रुझान बढ़ने लगा लगा ।
कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि मेरा यह सफरनामा, साहित्यिक बन चुका है। इस मंच से जुड़ने के बाद और धीरे-धीरे और भी कई मंचो से भी जुड़ने का मौका मिला।इस सफर में मेरा बहुत मन लगने लगा। सब कुछ जादू सा होता चला गया, जैसे-जैसे सफर में आगे बढ़ती गई सफर और भी खूबसूरत होता चला गया।उसी दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई जिनसे मैं पहली बार मिल रही थी। एक साहित्यिक गोष्ठी में जैसे ही वे कक्ष में दाखिल हुए, सभी सदस्य उनके अभिवादन में उठ खड़े हुए। मुझे आभास हो गया था कि यह कोई साधारण हस्ती नहीं है। पर तभी किसी ने बताया कि यह है लघुकथा के पुरोधा, हमारे अभिभावक और साहित्य जगत के वरिष्ठ लेखक "डॉक्टर सतीश राज पुष्करणा"जी। अपनी लेखनी में महारत हासिल करने वाले को इतनी सादगी में देखकर मैं आश्चर्यचकित थी पर जब तक उनके बारे में पूर्ण रूप से जान पाती तब तक उनका साथ हमेशा के लिए छूट गया।मुझे नहीं पता था कि वह इतनी बड़ी शख्सियत है लेकिन यह साहित्य हीं है जिसकी वजह से इतने बड़ी-बड़ी हस्तियों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
मैं बहुत अफसोस करती रह गई कि मेरे सामने लघुकथा के इतने बड़े जानकार, एक आम आदमी की तरह बैठे रहते थे और जो फायदा मुझे मिलना चाहिए था, मैं नहीं उठा सकी। यह साहित्य की ही देन है कि मुझे इतने बड़े-बड़े हस्ताक्षर से मिलने का मौका मिला उनसे यह सीखने का मौका मिला कि सफर बहुत लंबा है और सीखने की कोई उम्र नहीं होती।जब भी कुछ अपने आसपास देखती, उसे मेरी लेखनी कागज पर मोतियों की तरह उतार देती थी। मैं यह तो नहीं कहूँगी कि इस साहित्य के क्षेत्र में सारे लोग अच्छे ही मिले।कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पाँव खींचने के लिए आतुर रहते हैं। एक कहावत है-
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥
(इसका अर्थ है कि जो आपकी आलोचना करता है, उसे अपने पास ही रखना चाहिए। उसकी आलोचना बिना पानी और साबुन के ही आपके स्वभाव को शुद्ध करता है।) इस कहावत को ध्यान में रखकर, बहुतो के कटाक्ष को भी मैंने एक प्रोत्साहन के रूप में लिया और लिखती रही।सीखने का जज्बा समय के साथ-साथ बढ़ता ही गया। जिसमें मेरी अतरंग सखी सहेलियों से मुझे बहुत सहयोग मिला। वो सभी मेरी लेखनी को हमेशा प्रोत्साहित करती रही।
आज मैं अपने साहित्यिक सफरनामा के माध्यम से उन सभी को हार्दिक धन्यवाद देना चाहती हूँ जिसने जाने-नजाने में भी मेरी बहुत मदद की है। साहित्यिक सफरनामा के दौरान हीं राजगीर,ककोलत, बोधगया, पोखरा, तरुमित्र, मनेर, गहमर बिहार शरीफ,नवादा,पावापुरी, बाल्मीकि नगर, और इसके अलावा भी कई छोटे-बड़े जगहो पर जाने का सौभाग्य मिला।बड़े-बड़े मंचों पर पढ़ने का मौका मिला। साहित्यक गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिए कई संस्था के द्वारा स्मृति चिन्ह और सम्मान पत्र भी मिले, जिन में प्रमुख है -
विहार राज्य खादी ग्रामोद्योग भवन - स्मृति चिह्न।
’गोपाल राम गहमरी सारस्वत सम्मान’ – साहित्य सरोज एवं गहमर वेलफेयर सोसायटी, गहमर, उत्तर प्रदेश ।
’स्मृति चिन्ह’ – राजभाषा विभाग, पूर्व मध्य रेलवे, पटना ।
स्मृति चिन्ह’ – लेख्या–मंजूषा, पटना
रोटरी क्लब पटना - स्मृति चिह्न।
नेपाल भारत साहित्य महोत्सव - स्मृति चिह्न और प्रशस्तिपत्र।
मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच और सामयिक परिवेश साहित्यिक मंच - सम्मान पत्र और स्मृति चिन्ह।
इसी दौरान "आकाशवाणी" से भी कई बार मौका मिला। बिहार सरकार के तरफ से भी काव्य पाठ का मौका मिला और सम्मानित भी किया गया। यह साहित्यिक सफरनामा जिंदगी के आखिरी सांस तक चलता रहेगा क्योंकि जो जुनून और जज्बा अपने अंदर घर कर गया है उसे कभी मिटने नहीं देंगे। लिखने बैठे तो बताने के लिए बहुत सी बातें हैं इसलिए संक्षिप्त में अपनी बात रख रही हूँ।इसी उम्मीद के साथ साहित्यिक सफरनामा जारी रखते हुए अपनी बातों को विराम देती हूँ।
सीमा रानी पटना
70046 45606

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