पृथ्वी पर 71% जल क्षेत्र महासागर के रूप में हैं तो 29% स्थल मंडल के रूप में फैली है जिसमें पर्वत, पठार, मैदान, नदी क्षेत्र और वन और मरूस्थल का विस्तार है। विश्व में आदिकाल से ही धरती का प्रयोग अपनी आजीविका के लिए मनुष्य करता आया है। पहले उसने खाद्यान्न का उत्पादन अपने पालन पोषण के लिए किया है। फिर औद्योगिक विकास होने पर व्यावसायिक खेती होने लगी। पहले आदि मानव पारंपरिक औजारों से खेती पर्वतों, पठारों और मैदानों और नदी घाटियों और डेल्टा में करने लगा वहीं आज आधुनिक मशीनों से गहन और विस्तृत खेती करने लगा है जिससे न केवल कृषि का क्षेत्रफल बढ़ा है बल्कि प्रति हेक्टेयर उत्पादन के साथ उपज भी बेतहाशा वृद्धि हुई है। जिसके लिए मानव ने रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशक दवाओं, आधुनिक सिंचाई और उन्नत बीज का तेजी से प्रयोग किया है।
आज विश्व की जनसंख्या आठ अरब ( करीब 800 करोड़) हो गई है और खेती योग्य भूमि केवल एक-चौथाई ही उपयुक्त पायी जाती है।
भारत प्राचीन काल से ही कृषि प्रधान देश रहा है। १९४७ में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 75% आबादी कृषि पर निर्भर पूरी तरह थी। बीसवीं शताब्दी में औद्योगिक विकास नहीं हो पाया था और देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि आधारित रही है। लेकिन 21वीं शताब्दी में कृषि के साथ औद्योगिक विकास की भी प्रकिया तेजी से आगे बढ़ने लगी है।
भारत में कुल क्षेत्रफल का 45% भूमि खेती योग्य है जो कि विश्व के सभी देशों में से सर्वाधिक माना जाता है। भारत में खेती एक सभ्यता और संस्कृति मानी जाती है। 90% किसान छोटी जोत वाले हैं जबकि 10% ही बड़े किसान परिवार पाये जाते हैं। जब हम लोगों को आजादी मिली थी तब खेती पूर्णतः मानसून वर्षा पर निर्भर रहती थी। भारत में वर्षा सभी क्षेत्रों में समान नहीं होती है। केवल मानसून के चार महीने - जून, जुलाई, अगस्त और सितम्बर में 90% देश की वर्षा हो जाती है।
भूमि और खेती का संबंध करोड़ों किसान परिवार और ग्रामीण समाज से है जो कि 140 करोड़ भारतीय का पेट भरता है बल्कि खेती की उपज का विभिन्न उद्योगों में कच्चा माल के रूप में होता है जो कि करोड़ों भारतीयों को रोजगार प्रदान करता है। भारतीय किसान धरती को मां मानते हैं और असीम कृपा और आस्था रखते हैं। उनका मानना है कि खेती करना ईश्वर की पूजा करने जैसा होता है। धरती के साथ जहां जल संसाधन का संबंध है वहीं बाढ़, सूखा और अकाल भी धरती का संकट अभिन्न अंग माना जाता है। किसान ईमानदारी से खेती करता है। बाकी फल या परिणाम ईश्वर पर छोड़ देता है। जहां एक ओर प्राकृतिक आपदा किसान को गाहे-बगाहे घेरे रहती है वहीं मानवीय स्थितियां जैसे विद्युत वितरण में गड़बड़ी, बाजार में कृषि उत्पादन की मांग आपूर्ति में अनियमितता, खाद,बीज, आदि का कृत्रिम अभाव कृषि कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं। सभी का सामना किसान बहुत आसानी से करता है।
भारतीय कृषि करोड़ों किसानों का पालन -पोषण करती है। पहले यह खेती अनिश्चितकालीन व्यवसाय मानी जाती थी अब आधुनिक युग में मशीनी कृषि ने संजीवनी का कार्य किया है। जिसने किसानों की आय में अभूतपूर्व वृद्धि की है। यही नहीं हरित क्रांति से भारत न केवल कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भर हुआ है बल्कि दूसरे छोटे और गरीब देशों को संकट में खाद्यान्न की आपूर्ति करने में सक्षम हो गया है।
गंगा का मैदान बहुत विशाल है यहां बांगर और खादर जलोढ़क मिट्टी मुख्यतः पायी जाती है। जोकि कृषि के लिए उर्वरक होने के कारण उपयुक्त है।इस क्षेत्र में ३-४ वर्ष में मानसून सत्र में बाढ़ अवश्य आती है इससे फसलों का नुक्सान तो होता लेकिन नयी उर्वरक मिट्टी और उपजाऊ बना देती है। वैसे इस क्षेत्र में सूखा भी पड़ता है जब पर्याप्त वर्षा नहीं होती है। इसलिए यहां के किसानों को बाढ़ और सूखा से अक्सर पाला पड़ता है। खेती में लाभ-हानि प्रकृति की दैविक देन है।
इसलिए यह धरती किसानों की मां है जो करोड़ों परिवार का पोषण करती है और उनके पारिवारिक जीवन और सपनों को पूरा करने में सहयोग भी देती है। यही विधि का अटूट और अटल विश्वास है।
कोंडापुर
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