पत्रकारिता


भारत मजबूत लोकतंत्र का देश है l लोकतंत्र के तीन स्तंभ है --विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका l जो देश की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग करता हैl पर हमेशा से जो अप्रत्यक्ष रूप से चौथे स्तंभ के रूप में कार्य कर रही है वह है "पत्रकारिता"।      पत्रकारिता का योगदान स्वतंत्रता संग्राम में बहुत महत्वपूर्ण रहा पत्रकारिता के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम की खबरें लोगों तक प्रसारित करना,लोगों को शिक्षित होने के लिए प्रेरित करना, संगठित होने के लिए प्रेरित करना इत्यादि महत्वपूर्ण कार्य युद्ध स्तर पर किया गया l विदेशी शासन के प्रति लोगों को जागरूक करना, अपनी सांस्कृतिक संवेदना बनाए रखने में मदद करना क्योंकि लोग या तो डर में या अंग्रेजी हुकूमत की चाटुकारिता में अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे थे l 

   पत्रकारिता ने राजनीतिक, सामाजिक ,साहित्यिक ,आध्यात्मिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों में जनमानस को झकझोरने व प्रबुद्ध करने में अपना अमूल्य योगदान दिया है l स्वतंत्रता संग्राम में बाल गंगाधर तिलक का केसरी ,मराठा l जी .सुब्रमण्यम अय्यर का द हिंदू l गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रताप l सुरेंद्रनाथ बनर्जी का द बंगाली l ऐसी पत्रिकाओं ने देश प्रेम की लहर जगा दी और मातृभूमि की रक्षा के लिए कई सपूतों को सज्ज कर दिया l  उसे समय के प्रमुख कवियों में मैथिलीशरण गुप्त ,सुभद्रा कुमारी चौहान ,माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद उनकी कविताएं सुनकर शरीर के खून में ऐसे ही उबाल आ जाता था l कुल मिलाकर पत्रकारिता लोगों को जागरूक करने देशभक्ति जगाने व देश को समुन्नत बनाने में सहयोगी बने l 

   देश की स्वतंत्रता के पश्चात भी पत्रकारिता राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए सजक प्रहरी के रूप में खड़ी रही l आपातकाल के दौरान भी यह सजक प्रहरी के रूप में खड़ी रही l इस दौर में प्रिंटिंग तकनीकी में क्रांति हुआ और बहुत ही तीव्रता से ग्रामीण क्षेत्र में भी पत्रकारिता सर्वसुलभ हो गई जिसने जन चेतना के जागरण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई l  आगे प्रिंट के साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यम व प्राइवेट चैनलों का आगाज हुआ l जिससे सूचना ,मनोरंजन, शिक्षा के क्षेत्र में भी क्रांति का एक नयाआगाज हुआ l पत्रकारिता तकनीकी व व्यवसाय में आगे बढ़ता गया l इसका प्रभाव भी व्यापक हुआ लेकिन साथ ही आजादी के दौर में पत्रकारिता का जो मूल्य था उसका तेजी से क्षरण हुआ l पत्रकारिता में विज्ञापनों का प्रभाव तो बढ़ा परंतु संपादकीय गरिमा में कमी आती गई l

    अब संपादक सच्चाई व लोगों के हित में खड़े होने से अधिक चैनलों के व्यावसायिक हितों में अधिक खड़े हो रहे हैं l डिजिटल माध्यम के साथ इस क्षेत्र में नया आयाम जुड़ा इंटरनेट व स्मार्टफोन जो संचार क्रांति के एक नए स्तर पर जन जागरूकता का माध्यम बनती गई l   प्रिंट मीडिया, इंटरनेट व स्मार्टफोन यह तीनों ही हमें अब एक ही प्लेटफार्म पर उपलब्ध हो गया और वह है हमारा स्मार्टफोन जो जनता को जागरूक व शिक्षित करने की असीम संभावनाओं से भरा हुआ है l फिर जो माध्यम जितना सशक्त होगा उसके दुरुपयोग की संभावना भी उतनी ही अधिक रहती है l यही इन जनसंचार माध्यमों का सत्य भी है l 

प्रिंट मीडिया आज भी अपनी प्रमाणिकता सिद्ध करता है व पाठक आश्वस्त रहते हैं l परंतु इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रमाणिकता का संकट बना रहता है l उस न्यूज़ में कितना सच्चाई है कह नहीं सकते और लोग बिना सोचे समझे वायरल करने के चक्कर में उसको प्रसारित करते हैं l और इसमें होने वाले बहस में संवाद कम और विवाद अधिक दिखते हैं l फिर वही टीआरपी के चक्कर में जन सरोकार वाला पक्ष कहीं पीछे छूट जाता है l   डिजिटल माध्यम में दुरुपयोग की संभावना अधिक गंभीर व व्यापक है l फेक न्यूज़ की संभावना अधिक हो रही है l वायरल करने की सनक में ये माध्यम मूल उद्देश्यों से भटक रहे हैं l 

    पिछले दिनों महाकुंभ को कवर कर रहे पत्रकारिता के स्वरूप का दिग्दर्शन हुआ l इसमें मीडिया का चरित्र बहुत कुछ उभर कर सामने आया l एक तरफ इसकी महिमा मंडन तथा दूसरी तरफ इसकी कमियां तलाशने की वृत्ति दिखी l जो कमियां दिखा रहे हैं वह कमियां ही गिनते रहे ,ना जाने कितनी फेक न्यूज़ सामनेआए l इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने कुछ ऐसे लोग व घटनाओं को उजागर किया जो मूल महाकुंभ के उद्देश्य से भटक गए l 60 करोड लोगों की भीड़ का प्रबंध कैसे किया गया होगा ,उनका भोजन ,आवास की व्यवस्था यह सब शोध का विषय था l महाकुंभ के आर्थिक विकास में भूमिका से लेकर सांस्कृतिक, आध्यात्मिक चेतना के विस्तार में योगदान को लेकर कुछ पत्रकार ने अपनी सजगता दिखाई थी l 

     विदेशी मीडिया व जनमानस के लिए यह महाआयोजन कौतुक का विषय बना l विश्व के इतने बड़े समागम में कुछ घटनाएं होनी लाजमी है परंतु उसी  को बढ़ा चढ़ा कर दिखाना उसको बात कर घसीटना कहां तक उचित था l इस महा आयोजन में पधारे साधु संत ,विदेशी मेहमान ,महात्माओं के साथ सार्थक संवाद व इसका आयोजन का उद्देश्य भी गिने चुने पत्रकारों में ही दिखी l     अधिकांशत  टीआरपी बढ़ाने व वीडियो वायरल करने के चक्कर में कुछ भी ऊलजुलूल खबर व भ्रामक खबर जनता को मूर्ख बनाते दिखे l तथाकथित यूट्यूब और कई पत्रकारों में धर्म, अध्यात्म व संस्कृति के आधारभूत तथ्यों का बोध नहीं दिखा और ना ही वे इस आयोजन का महत्व जान पाए l 

आज टीवी चैनलों में किसी विषय को लेकर डिबेट होता है वहां संवाद, वार्तालाप या समस्या पर चर्चा कम और विवाद अधिक होता है l जिस उद्देश्य से उस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है वह तो कहीं पीछे छूट जाता है l सामने आती है विवाद जहां कई बार अमर्यादित भाषा का भी उपयोग हो जाता है l सम्मान सौहार्द कहीं विलुप्त हो जाती है l पर चैनल को टीआरपी बढ़ाना है l कई बार ऐसे सो देखकर पब्लिक अपने आपा में नहीं रहती है अतः अप्रत्यक्ष कहे तो यह जनमानस को भटकाती है ना की समस्या को सामने लाती है या समाधान बताती है l वर्तमान में हमें कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो अपने आप को पत्रकार बताते हैं पर उनके पास लाइसेंस भी नहीं रहता है l यूट्यूब पर चैनल बनाकर या प्राइवेट चैनल बनाकर पत्रकारिता का गलत तरीके से दुरुपयोग करते हैं l एक घटना अभी सामने आई थी l गांव में सरकारी कर्मचारी का किसी युवती के साथ अफेयर था l कुछ पत्रकारों ने उनसे पैसे की मांग की व धमकी दी ना देने से पेपर में छाप देंगे l 

  उसे कर्मचारियों ने आत्महत्या कर ली बाद में पता चला उन लड़कों के पास तो लाइसेंस भी नहीं था और ना ही वे कोई विशेष अखबार या पत्रिका के पत्रकार हैं l कर्मचारी ने सुसाइड नोट भी छोड़ा था पर सब बच गए l   ऐसे में वर्तमान में ऐसे  पत्रकारों की जरूरत महसूस हो रही है जो पूर्णतः प्रशिक्षित हो और अपने पेशे के कौशल के साथ जीवन मूल्यों की भी समझ रखते हो l पत्रकारिता में जवाब देही एवं मूल्यों का समावेश समय की सबसे बड़ी मांग है l धर्म प्रधान देश में , संस्कृति प्रधान देश में उसका महत्व और बढ़ जाता है l ऐसे में देश ऐसे पत्रकारों का भाव भरा आह्वान करता है जो जनसंचार के माध्यम से जनमानस को जगा सके अपने देश की संस्कृति को बचा सके l 

          दीपमाला वैष्णव 
           कोंडागांव (cg)
          9453824524





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