चंपा, आंवले, आम के हरे-हरे पत्ते हवा में लहरा रहे थे, चिड़ियों का चहकना बंद हो गया था, मैं अपने कमरे की खिड़की से बाहर हवा में लहराते हुए पत्तों को देख रही थी, बाहर देखते-देखते, मैं अतीत में खो गई, बात लगभग दस साल पुरानी थी, जब मेरी अमरनाथ यात्रा ईश्वर की कृपा से संपन्न हुई थी मेरी मां एक धार्मिक महिला थी इस कारण घर का वातावरण धार्मिक था, मेरी बड़ी बहन ,जो घर की सबसे बड़ी बेटी थी उनकी रुचि, धार्मिक किताबों के पठन-पाठन में थी, वह हमेशा ही कुछ ना कुछ पढ़ती रहती थी, फिर हमें भी धर्म के बारे में हमेशा कुछ न कुछ समझाती और बताती रहती थी। इस कारण मैं भी धार्मिक प्रवृत्ति की हो गई थी। बड़े होने पर मेरी शादी के बाद जब मैं अपने पति के साथ किसी भी यात्रा पर जाती थी तो वहां के दर्शनीय स्थलों के साथ ही साथ धार्मिक स्थलों के भी दर्शन अवश्य करती थी। एक बार मेरे मन में बाबा अमरनाथ के दर्शन की तीव्र इच्छा जागृत हुई यह बात दो हजार तेरह की है, हमारे पति भी तुरंत हमें अमरनाथ यात्रा पर ले जाने को तैयार हो गए, हमने भोपाल में ही कश्मीरी बैंक से अपना रजिस्ट्रेशन कराया, सिविल सर्जन से स्वास्थ्य संबंधी जांच कराई, फिटनेस सर्टिफिकेट लिया और यात्रा की तैयारी में जुट गए,
हमारे तीनों बच्चों की शादियां हो चुकी थीं, मेरे पुत्र ने श्रीनगर तक प्लेन की टिकट और पहलगांव से पंचतरणी तक हेलीकॉप्टर की टिकट का इंतजाम कर दिया था, हम गर्म कपड़े और यात्रा में जरूरी वस्तुओं को लेकर नागपुर से श्रीनगर हवाई जहाज से पहुँचे, क्योंकि भोपाल से सीधी फ्लाइट श्रीनगर तक नहीं थी, मेरे भाई नागपुर में सैटल हो गए थे अतः इस बहाने हम उनसे भी मिल लिए, हम श्रीनगर के उस होटल में रुके जो लाल चौक से लगभग लगा हुआ था, नीचे दुकान थी ऊपर हमारा होटल था खिड़की से कुछ ही फीट दूर ही सामने लाल चौक के टावर जिस पर घड़ी लगी हुई थी दिख रहा था, रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन हमने श्रीनगर के सुंदर गार्डन, जैसे शालीमार बाग ,निशात बाग, चश्माशाही, ट्यूलिप गार्डन आदि देखे, दूसरे दिन शंकराचार्य के मंदिर के दर्शन किए, हमने श्रीनगर का बाजार भी घूमा, तीसरे दिन मैंने अपने पति से कहा कि होटल के पास वाले टैक्सी स्टैंड से पहलगांव जाने के लिए टैक्सी लेकर आओ, परंतु हमारे पति ने कहा कि यदि टैक्सी स्टैंड से टैक्सी लेकर पहलगाम चलेंगे तो किसी को भी पता नहीं चलेगा कि कौन हमें यहां से लेकर पहलगांव गया है, यहां आतंकवादी गतिविधियां होती रहती हैं अतः हम जिस होटल में रुके हैं उससे ही कहकर टैक्सी बुक करवाएंगे ताकि यदि कुछ गड़बड़ हो तो पुलिस हमारी खोज खबर कर सके कम से कम होटल वाला यह तो बता देगा कि हम किस टैक्सी से यहां से निकले थे, मुझे भी उनकी बात सही लगी, हमारे पति ने होटल के कर्मचारी से टैक्सी के लिए कहा होटल का कर्मचारी जिस टैक्सी को लेकर आया था उसका ड्राइवर बाईस सौ रुपए मांग रहा था ,मेरे पति ने दो हजार देने की बात की, परंतु वह तैयार नहीं हुआ अतः हमने उसे बाईस सौ रुपए देने के लिए हां कर दी।
हमारा सामान
दो सूटकेस दो कंधे पर टांगने वाले बैग थे, सूटकेसों पर हवाई यात्रा के दौरान लगाए
जाने वाले टैग लगे थे, कोई भी जान
सकता था कि हम लोग पैसे वाले हैं, ड्राइवर ने इनोवा की डिक्की में
सामान रखा, हम दोनों
ड्राइवर के पीछे वाली सीट जो बीच की
थी पर बैठ गए, सेवन सीटर
गाड़ी की केवल तीन सीट भरी थीं, हमारे पीछे वाली
तीनों सीटें खाली पड़ी थीं, होटल से
चलने के थोड़ी देर बाद हमारा ड्राइवर कहने लगा
साहब, मेरा भाई
जिसका घर अभी रास्ते में पड़ेगा वह भी पहलगाम जाना चाहता है, गाड़ी खाली है उसे भी पीछे बैठा
लेते हैं, ड्राइवर के
बगल की सीट भी खाली थी परंतु वह
उसे पीछे बैठाने की बात कर रहा था, तब हमारे पति ने सख्ती दिखाते हुए उसे मना
कर दिया, उससे कहा
हमने पूरी गाड़ी के पैसे दिए हैं, और यह मुझे
बिल्कुल भी पसंद
नहीं कि कोई दूसरा गाड़ी में बैठे। मुझे लगा कि मेरे पति को मना नहीं करना चाहिए, आखिरकार गाड़ी की पिछली तीनों सीट
पूरी तरह खाली तो पड़ी हैं, मगर मैं चुप रही
क्योंकि मेरे पति की सतर्कता हमेशा सही रहती थी, जब हम रास्ते में आगे बढ़े तो
सड़क के दोनों तरफ गन लिए दो-दो सैनिक खड़े हुए दिखाई दिए, ये सैनिक सारे रास्ते
में लगभग हर आधे किलोमीटर दूर खड़े थे, ये सैनिक हाथों में बंदूक लिए सड़क की
दोनों साइड की पहाड़ियों की निगरानी कर रहे थे क्योंकि आतंकी खतरा वहीं से था।
बैरिकेडिंग के कारण ड्राइवर को कार रोकनी पड़ी, ड्राइवर ने कहा यह सब रिश्वत लेने के लिए खड़े हुए हैं, आप लोग चिंता नहीं करें, सौ-दो सौ लेकर ये अभी रास्ता खोल देंगे, वह कार में से उतर कर जहां उनका ऑफिसर और दूसरे सैनिक खड़े थे वहां गया, इतने में एक सैनिक हमारे पास आया, हमसे पूछा कहां जा रहे हो, हमने बताया बाबा अमरनाथ के दर्शन करने जा रहे हैं, उसने कहा आपके पास रजिस्ट्रेशन है, हमने अपना रजिस्ट्रेशन दिखाया, वह यह सब यह दिखाने के लिए कर रहा था कि वह हमारी चेकिंग कर रहा है, परंतु वास्तव में उसका उद्देश्य दूसरा था, हमारे द्वारा दिए गए रजिस्ट्रेशन को देखते समय वह धीरे से हमसे बोला, यह रास्ता सरकार द्वारा अमरनाथ यात्रा के लिए निर्धारित रास्ता नहीं है, यह आखिरी चेक पोस्ट है, इसके आगे घना जंगल है, कोई सुरक्षा नहीं है, आगे आपके साथ कुछ भी हो सकता है। इतने में वह ड्राइवर लौट आया, शायद उसने परमिशन ले ली थी, उस समय वहां के सैनिक लोकल लोगों से पंगा लेने से बचते थे, ड्राइवर के आते ही मेरे पति ने उससे सख्त स्वर में कहा कि तुम इस रास्ते से गाड़ी लेकर क्यों आए, यह रास्ता सरकार के द्वारा अधिकृत नहीं है, तो वह बोला कि यह शॉर्टकट है और इस रास्ते से अपन जल्दी पहुँच जाएंगे, मेरे पति ने उससे कहा कि मुझे तुम्हारी गाड़ी का पेट्रोल बचाने की कोई चिंता नहीं है, थोड़े से रुपए बचाने के लिए तुम हमें खतरे में डाल रहे हो, गाड़ी को वापस मोड़ो और निर्धारित मार्ग से चलो, हम यहां से नहीं जाएंगे। हम लोग ग्यारह किलोमीटर आ गए हैं, अब ग्यारह किलोमीटर लौटना पड़ेगा, ड्राइवर ने कहा। ग्यारह किलोमीटर आ गए हों या पचास, गाड़ी वापस मोड़ो, तुम अपनी मर्जी से आए हो, मेरे पति ने कहा।
मेरे पति और ड्राइवर के बीच बहस होते देख के बहुत सारे सैनिक और उनका अफसर जो थोड़ी दूर खड़े थे गाड़ी के पास आ गए, उनके आते ही ड्राइवर चुप हो गया, जरूर ड्राइवर ने उनसे झूठ बोला होगा कि सवारियों को जल्दी है या सवारियों के कहने पर ही वह गाड़ी इस ओर लाया है, जो भी हो हमारे ड्राइवर के खिलाफ जाते ही उसे अंदेशा हो गया था कि अब ये सैनिक उसको रगड़ देंगे, उसने चुपचाप गाड़ी में बैठ कर गाड़ी मोड़ दी, ग्यारह किलोमीटर बाद हम मेन रोड पर उस जगह पहुंचे जहां से उसने गाड़ी को जंगल के रास्ते पर डाला था। मेन रोड चार लेन की थी, वहां से अमरनाथ जाने वाली गाड़ियों और अमरनाथ से वापस आने वाली ढेरों गाड़ियां लगातार चल रही थीं, हम लोगों ने संतोष की सांस ली, हम लोग बच गए थे। हम लोग तो खुश थे कि खतरा टला, परंतु हमारा ड्राइवर बड़ा नाखुश था, वह सारे रास्ते लगातार बड़बड़ाता रहा, कहीं कोई आतंकी नहीं है, कहीं कोई खतरा नहीं है, लोग-बाग तो फालतू की बातें करते हैं आदि आदि।
मेरे पति ने रास्ते में आधे-आधे किलोमीटर दूर खड़े हुए
मिलिट्री के सैनिकों को उसे दिखाते हुए कहा कि अगर खतरा नहीं है तो ये सैनिक यहां क्यों
खड़े हुए हैं। जब भी मेरे पति उसे रास्ते पर खड़े हुए मिलिट्री मैन दिखाते थे तब वह
उनकी बात पर ध्यान नहीं देता था और थोड़ी आगे जाकर जहां कोई मिलिट्री मैन नहीं
होता था, कहता था कहां है मिलिट्री मैन, कहीं
कोई खतरा नहीं है। मैंने अपने पति को चुप रहने का इशारा किया, उन्होंने भी समझदारी दिखाते हुए उससे
बहस करनी बंद कर दी और उसे बड़बड़ाने दिया।
दो घंटे बाद हम लोग अनंतनाग होते हुए पहलगाम पहुंचे, ड्राइवर हमें होटल के गेट पर ही छोड़कर पैसा लेकर चला गया, उसने कार की डिक्की से हमारा सामान निकालकर अंदर होटल में पहुंचाने की भी कोई कोशिश नहीं की, हम ही लोगों ने कार से सामान निकाला और उसे लेकर अंदर होटल के काउंटर पर पहुंचे, उसके जाने के बाद हम लोगों ने चैन की सांस ली थी, उस समय शाम हो रही थी, हम लोग फ्रेश होकर बाहर निकले, पहलगाम का बाजार देखा, हमारे होटल के सामने सड़क थी, सड़क के उस पार कार पार्किंग थी, पार्किंग में करीब सौ से अधिक कारें खड़ी थीं, पार्किंग के आगे नदी बह रही थी, नदी के उस पार ऊंचे-ऊंचे पहाड़ खड़े थे, जब हम बाजार से लौट कर आए रात हो गई थी, चांदनी रात थी, शायद पूर्णिमा थी, हम लोग कमरे की बालकनी में बैठकर, पहाड़ों, नदी के ऊपर बिखरी चांदनी की छटा का आनंद ले रहे थे। बहुत ही सुंदर जगह थी, हम अपना टेंशन भूल गए और वहां की सुंदरता को काफी देर तक निहारते रहे। अगले दिन सुबह हम लोग जल्दी उठ गए, पहलगाम की सुबह बहुत ही सुहावनी थी, चारों ओर ठंडी हवा चल रही थी और वातावरण में एक अलग ही ताजगी थी, हम लोग तैयार होकर नीचे आए, होटल में नाश्ता किया और उसके बाद अमरनाथ यात्रा के अगले पड़ाव के लिए निकल पड़े।
पहलगाम से आगे जाने के लिए हमें लोकल टैक्सी लेनी पड़ी, क्योंकि यहां से आगे प्राइवेट गाड़ियों को जाने की अनुमति नहीं थी, हमने एक टैक्सी की और चंदनवाड़ी के लिए चल पड़े, रास्ता बहुत ही सुंदर था, दोनों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़, बीच में बहती नदी और चारों ओर हरियाली, ऐसा लग रहा था मानो हम किसी स्वर्ग में आ गए हों। चंदनवाड़ी पहुंचने के बाद हमें वहां से पैदल यात्रा शुरू करनी थी, कुछ लोग घोड़े किराए पर लेकर जा रहे थे, कुछ लोग पालकी में बैठकर जा रहे थे, परंतु हमने पैदल चलने का निर्णय लिया, शुरुआत में रास्ता थोड़ा आसान था, परंतु धीरे-धीरे चढ़ाई बढ़ती गई और रास्ता कठिन होता गया।रास्ते में जगह-जगह पर लंगर लगे हुए थे, जहां यात्रियों को मुफ्त में खाना और चाय दी जा रही थी, लोग बहुत सेवा भाव से यात्रियों की मदद कर रहे थे, कोई पानी पिला रहा था, कोई दवा दे रहा था, तो कोई थके हुए यात्रियों को बैठने के लिए जगह दे रहा था, यह सब देखकर मन बहुत प्रसन्न हो रहा था। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, मौसम भी बदलता गया, कभी धूप निकल आती थी, तो कभी बादल छा जाते थे, और कभी-कभी हल्की बारिश भी होने लगती थी, हमें अपने साथ रेनकोट और गर्म कपड़े रखने पड़े, क्योंकि मौसम का कोई भरोसा नहीं था।
काफी देर चलने के बाद हम शेषनाग पहुंचे, वहां का दृश्य बहुत ही अद्भुत था, एक बड़ा सा नीला झील और उसके चारों ओर बर्फ से ढके पहाड़, ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति ने अपनी सारी सुंदरता यहीं पर उंडेल दी हो, हमने वहां कुछ देर विश्राम किया और फिर आगे बढ़ने की तैयारी करने लगे। शेषनाग से आगे का रास्ता और भी कठिन था, ऊंचाई बढ़ती जा रही थी और सांस लेने में भी थोड़ी तकलीफ हो रही थी, परंतु बाबा अमरनाथ के दर्शन की इच्छा हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी, रास्ते में कई बार ऐसा लगा कि अब और नहीं चला जाएगा, परंतु फिर भी हम हिम्मत करके आगे बढ़ते रहे। आखिरकार हम पंचतरणी पहुंचे, यह अमरनाथ गुफा से पहले का अंतिम पड़ाव था, यहां पर हमने रात बिताई, अगले दिन हमें गुफा तक पहुंचना था, रात में ठंड बहुत ज्यादा थी, परंतु मन में उत्साह भी उतना ही था।
अगले दिन सुबह हम लोग जल्दी उठे और अमरनाथ गुफा की ओर चल पड़े, रास्ता बहुत कठिन था, परंतु जैसे-जैसे हम गुफा के पास पहुंचते गए, हमारे अंदर उत्साह बढ़ता गया, आखिरकार वह क्षण आ ही गया जब हमने बाबा अमरनाथ के दर्शन किए, गुफा के अंदर बर्फ से बना शिवलिंग देखकर मन भाव-विभोर हो गया, ऐसा लग रहा था कि हमारी सारी थकान एक ही पल में दूर हो गई हो। दर्शन करने के बाद हम कुछ देर वहां रुके और फिर वापस लौटने की तैयारी करने लगे, यह यात्रा हमारे जीवन की एक अविस्मरणीय यात्रा बन गई थी, जिसे हम कभी भी नहीं भूल सकते।
पता- Dx-74
शिवा रायल पार्क,फेस-वन
सलैया भोपाल
पिन- 462047
मोबाइल नंबर- 8109666346

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