निहारिका बर्तुल-नीलम

आप का इस बेवसाइट पर स्‍वागत है।  साहित्‍य सरोज पेज को फालो करें https://www.facebook.com/sarojsahitya.page/
चैनल को सस्‍क्राइब कर हमारा सहयोग करें https://www.youtube.com/channe /UCE60c5a0FTPbIY1SseRpnsA


निहारिका प्लेटफार्म पर अपनी ट्रेन का इन्तजार कर रही है. पर थोड़ी देर में पता चलता है कि ट्रेन दो घंटे लेट है.ओह इस अजनबी शहर में अब कैसे दो घंटे बीतेंगे.वो अपने सामान पर सिर टिका कर सो जाती है.  बार बार अपना  सामान देखती है और आंखे मूंद लेती है.छोटा स्टेशन होने के कारण ज्यादा चहलकदमी नहीं है. तभी उसके सामने एक अजनबी आता है और कहता है कि आप अपना सामान नीचे रख लीजिए मैं बहुत देर सुबह खड़ा खड़ा थक गया हूँ. निहारिका ने देखा कि थोड़ी दूर पर एक बैंच खाली है पर उसने उससे बात करना उचित  नहीं समझा और उसके लिए जगह बना दी.निहारिका ने कनखियों से उस अजनबी की तरफ देखा. सफेद कुर्ता पायजामा व  गर्दन में केसरिया रूमाल होंठ शायद पान से लाल और सांवला रंग बड़ी बड़ी आंखे घनी मूंछे और  सुगठित शरीर. बोली से पूरब का लग रहा था. तभी एक और आदमी वहाँ आया और बोला थोड़ा उधर हो जाइए. निहारिका कुछ कहती उससे पहले ही  बगल में बैठा वह अजनबी बोला उधर देखिए वहाँ भी जगह है.उस व्यक्ति के जाते ही निहारिका हंस दी. अजनबी बोला मेरा नाम बर्तुल पारिकर है.आप हंसी क्यों क्या आपको इन्सान की पहचान नहीं  देखो कितना अजीब  लग रहा था वो.और  बहुत देर से आपको घूर घूर कर देख रहा था. निहारिका बोली  क्षमा कीजिये मैं किसी अजनबी से बात भी नहीं करती और विश्वास भी नहीं करती.वह तपाक से बोला मत कीजिये  बात और विश्वास.पर जब आप घर से बाहर है तो सावधानी पूर्वक बैठिये. कुछ हो गया तो फिर आप ही समाज को दोष देंगी.निहारिका को लगा ये  बर्तुल महाशय जरूर कोई शिक्षक होंगे या समाज सुधारक. तभी ट्रेन आ  गयी. अभी तक निहारिका को उपदेश देते हुए बर्तुल जी  एकदम कहाँ पहुँच गये निहारिका  को पता ही नहीं चला।
ट्रेन के जिस डिब्बे में निहारिका चढी वो खचाखच भरा हुआ था. बर्तुल ने बताया था कि  अगले स्टेशन पर भीड़ नहीं रहती.निहारिका बहुत मुश्किल से ट्रेन में चढी.बैठने के लिए जगह मिल पाने का कोई सवाल ही नहीं था. तभी  उसने देखा बर्तुल जी सामने वाली सीट पर बैठे उसको इशारे से बुला रहे हैं.उस सीट पर सामान सहित पहुँच पाना निहारिका के लिए बहुत मुश्किल था. बर्तुल ने यह समझा और निहारिका का सामना उठा कर रास्ता बनाते हुए सीट तक ले आया.अब निहारिका ने मुस्करा कर उसको शुक्रिया कहा.पर बर्तुल  जी तो खिड़की से बाहर झांक रहे थे  . अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकी और  यात्री उतर गये. ये शायद सभी लोकल  यात्रा वाले ही थे. क्योंकि उनके पास सामान  भी नहीं था और आपस में उनकी बातचीत से भी यही अनुमान लग रहा था.  अब डिब्बे में शान्ति थी उसने बर्तुल की तरफ देखा वो अभी भी बाहर की ओर ही देख रहे थे. मेरा नाम निहारिका है . जी अच्छा नाम है. शुक्रिया.आप कहाँ जा रहे हैं निहारिका ने बातचीत करने के उद्देश्य से पूछा.घर उसने जवाब दिया.निहारिका ने कहा ये भी कोई जवाब है  मैंने जगह जानना चाहती थी जी  प्रयागराज और आप मैं भी वही जा रही हूँ बहुत  अच्छा यह कहकर बर्तुल फिर एक किताब खोल कर पढने लगा. निहारिका को इस व्यक्ति में रूचि उत्न्नन हो गयी. आज तक ऐसे व्यक्ति से वह कभी नहीं मिली थी.. क्या करता होगा ये.कुछ देर  बाद चुप रहने के बाद निहारिका ने फिर पूछा आप क्या काम करते हैं.बर्तुल ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा क्यों जानना चाहती है आप. निहारिका ने कहा वो बोर हो रही है इसलिए बात कर अपना समय गुजारना चाहती है. अच्छा तो आपको मनोरंजन करने वाला चाहिए. इसके बाद बर्तुल ने जो बात शुरू की तो  चुप होने का नाम ही न लिया. निहारिका हैरान थी जिंदगी के सभी पडाव का देश के समस्त भाग की आर्थिक भौगोलिक राजनैतिक सभी तरह की जानकारी थी और बोलने का तरीका भी  इक आलग अन्दाज लिए कुछ शब्द उसके तकिया कलाम थे जैसे फिर मत कहना मुझे कुछ समझे आया समझ कुछ निहारिका ने कहा आप तो बहुत लाजवाब है आपकी बातों से मैंने महसूस किया कि आपने दुनिया के सभी काम करके देखे हैं पर आप आजकल क्या करते हैं.बर्तुल ने मुस्कुरा कर कहा मैं आजकल एक उपन्यास लिख रहा हूँ।और उसी के लिए इधर से उधर घूम रहा हूँ. अच्छा इतनी मेहनत. पर आप रहते कहाँ है  मेरा कोई ठिकाना  नहीं ज्यादा दिन नहीं ठहर पाता एक जगह.।
अब अगले स्टेशन पड उतर जाऊँगा पर आप तो आगे तक जाने वाले थे हां पर अब कुछ दिन बाद  उधर आऊंगा.निहारिका को लगा सच ही कहा था कुछ देर पहले  इसने मुझे इन्सान की पहचान नहीं पर ऐसे विचित्र चरित्र को समझ पाना इतना आसान भी नहीं जब वो प्लेटफार्म पर उसके करीब आकर बैठा था और गाड़ी में अपनी सीट भी देता है पर है  व्य्वहार का  बहुत रूखा . निहारिका को अच्छा नहीं लग रहा था उसका यूँ अचानक बिछुड़ जाना  बर्तुल जी वही तक चलो फिर इस जाना मैं  इधर पहली बार आई हूँ आप रहेंगे तो अच्छा रहेगा.यह सुनकर वह एकदम भडक गया और निहारिका को घूरते हुए बोला ये क्या बोल रही हैं आप. यहाँ और भी लोग बैठे है कोई चोर लुटेरा हुआ तो तुम्हारे रुपये पैसे लेकर भाग जाएगा.निहारिका को भी महसूस हुआ भावावेश में उससे बहुत गलती हो गई. तभी उनकी बगल में खड़ा एक आदमी बोला आपको उतरना है तो इधर आ जाईये अब हम बैठ जाते हैं . निहारिका ने बर्तुल की तरफ देखा. उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था नहीं मुझे आगे ही जाना है.यह सुन निहारिका के चेहरे पर मुस्कान आ गई और कुछ पल बाद वो आंखे मूंद कर सोचने लगी बहुत ही दिलचस्प है ये महाशय कभी   कुछ कहते हैं कभी कुछ  अब दोनों की मंजिल आने ही वाली थी बर्तुल तो शान्त बैठा था पर निहारिका उसको और जानना चाह  रही थी क्या आपसे फिर कभी मुलाकात होगी नहीं मुझे नहीं लगता बर्तुल ने सपाक से कहा क्योंकि अब में इधर कभी नहीं आऊंगा मेरा कनाडा जाने का मन हो रहा है बात तो हो सकती है न आप अपना नम्बर दे सकते है क्या मैं नहीं प्रयोग करता फोन कभी कभार कर लेता हूँ और ये कहकर अपना नम्बर निहारिका को दे दिया.उस स्टेशन के बाद फिर दोनों ने एक दूसरे को अलविदा कहा  ।
निहारिका अक्सर उसको याद कर मुस्करा देती उसने अनेक बार उसको फोन किया पर किसी ने नहीं उठाया और न कभी निहारिका के मैसेज का जवाब. निहारिका को कोई  आश्चर्य नही था क्योंकि नम्बर दे्ने से पूर्व ही उसने बता दिया था कि वह फोन का ज्यादा प्रयोग नहीं करता.पर एक दिन उसका फोन आता है नये नम्बर से निहारिका जी कैसी है आप .निहारिका बहुत खुश होती है और उससे खूब बातें करती है. इस तरह तीन चार महीने में एक बार उसका फोन आ जाता पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि निहारिका ने फोन किया हो और उसने ऊठाया हो.इक बार उसका फोन आया निहारिका ने उससे कहा कि वह उसको भूल नहीं पाती यूँ लगता है जैसे बहुत प्यार हो गया है तुमसे बर्तुल ने कहा निहारिका जी ये आपका विभ्रम है भ्रम में तो कुछ अंश हकीकत होती भी है  विभ्रम तो बिलकुल असत्य होता है कुछ भी नहीं होता और बहुत कुछ समझ लिया जाता है.उस दिन निहारिका बहुत उदास हो गई अब बर्तुल के प्रति उसका दृष्टिकोण एकदम बदल गया.इस घटना के छ. माह पश्चात बर्तुल का फोन आता है और कहता है वह भी प्यार के एहसास को महसूस कर रहा है उस दिन से आहत निहारिका वही जवाब दोहरा देती है. कुछ दिन बाद बर्तुल का फोन आता है कि वह कनाडा  में बस गया है और वही की एक लड़की से शादी भी कर ली है उसका उपन्यास पूरा हो गया है.और अब  उसने  बहुत सी साहिति्यिक पुस्तकों का प्रकाशन भी शुरू कर दिया है उसकी पत्नी भी लेखिका हैं तुम्हें अपना उपन्यास की एक प्रति भेज रहा हूँ.निहारिका ने अपने हाथ में लिये उपन्यास की तरफ देखा जिस पर लिखा था  निहारिका को समर्पित और उसके होंठ मुस्करा दिये पर आंखे नम हो गई।. 


नीलम शर्मा


विकासनगर देहरादून उतराखंड


 



 


 


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ