आप का इस बेवसाइट पर स्वागत है। साहित्य सरोज पेज को फालो करें( https://www.facebook.com/sarojsahitya.page/
चैनल को सस्क्राइब कर हमारा सहयोग करें https://www.youtube.com/channe /UCE60c5a0FTPbIY1SseRpnsA
टेबल पर पड़ी चाय ठंडी हो रही थी परंतु सारिका चाहते हुए भी उसे वह पी नहीं पा रही थी उसे किताबें पढ़ने का बहुत शौक था मगर वह भी उसे घर परिवार में वक्त की कमी के कारण ना मिल पाता था। कब सुबह से रात हो जाती पता ही नहीं लगता था जीवन में व्यस्तता के चलते समस्याओं से जूझते 3 बच्चों का भार उस पर से तीनों लड़कियों की जिम्मेदारी ने उसके जवान कंधों को कब झुका दिया सुंदर यौवन पर ना जाने कब झुर्रियों कारूप ले लिया पता ही नहीं चला जब एक दिन आईने में देखा तो अपने आप को पहचान ही नहीं पाई। अपने पति विनोद की बात याद आती कि तुम नौकरी करो मैं अकेले सारी जिम्मेदारियां नहीं निभा सकता वह मजबूर थी बच्चियों के भविष्य का सवाल था बचत तो करना चाहती थी मगर विनोद उसे कोई संयोग नहीं करता था। एक छोटे से गांव से वह उदयपुर शादी करके ढेरों सपने सजा के आ तो गई मगर बड़े शहरों में रहना आसान काम नहीं था शुरू में वह संयुक्त परिवार में थी और विनोद छोटे थे इसलिए उन्हें कोई जिम्मेदारियों का एहसास नहीं था। घर छोटा पड़ने पर सब अलग हो गए और फिर अकेले ही उसे बच्चों को संभालना था विनोद अपने बड़े भाई के साथ सुबह दुकान जाते तो रात में ही आते इस बीच जरूरत का सामान हो या कोई सब्जी उसे ही लाना होता और कभी झुंझूला कर बोल देती तो झगड़े और मारपीट होती बहुत मन करता सब कुछ छोड़ देने का मगर बच्चों का मुंह देखकर सहन कर लेती विनोद घर खर्च के भी ठीक से पैसे नहीं देते थे उन्हें अपने बड़े भाई से पैसे मांगने में शर्म महसूस होती थी बड़ी मुश्किल से उसने थोड़ा बड़ा करके बच्चों को एक स्कूल में नौकरी कर ली । घर का पूरा काम बाहर की नौकरी जब रात में मन करता कि थोड़ा टाइम से सो जाए तो उसमें भी विनोद को तवे से उतरती रोटी थाली में चाहिए होती वह भी अपने समय के हिसाब से। सुबह वही 4:00 बजे उठाओ सब का टिफिन पैक करो पतिदेव को तो कुकर की सीटी बजने से भी नफरत थी मगर टिफिन में उनको अलग सब्जी चाहिए और नाश्ते में अलग ऐसे करते-करते तीनों बेटियां तब बड़ी हो गई और सारिका की जिम्मेदारियां भी पता ही नहीं चला उसे कब इस बीच दिल का दौरा भी पड़ गया और ना जाने कौन-कौन सी चिंताओं ने उसे अंदर ही अंदर खोखला कर दिया फिर बेटियों की शादी का मौका भी आ गया एक एक करके अपने गहने बेचकर उसने तीसरी बेटी को भी विदा किया ।
फिर धीरे से उसकी आंखों ने भी साथ छोड़ दिया अचानक दिखना बंद हो गया। और फिर स्कूल भी छोड़ना पड़ा ऐसी थी सारिका के द्वंद की कहानी जो एक मध्यम वर्गीय कई महिलाओं में देखने को मिल सकती है शायद वो हमारे आस-पास ही हो ।
शिल्पा अरोड़ा
विदिशा मध्यप्रदेश
विदिशा मध्यप्रदेश
0 टिप्पणियाँ