क्यों बढ़ रही हैं आत्महत्या की प्रवृत्ति? शिल्‍पा


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त्महत्या बड़ा ही डरावना सा लगता है सुनते ही जैसे दिमाग में सीधे आघात चालकता है आत्महत्या आखिर क्यों की होगी इस व्यक्ति ने तब जब हम उसे जानते हो या मिले हो क्या इतनी बुरी परिस्थितियां रही होंगी उसके जीवन में कि वो इसे किसी से साजा ही नहीं कर पाया उसे देखकर तो कभी ऐसा महसूस नहीं किया हमने और क्या कोई समस्या इतनी बड़ी हो सकती हैं कि उसका कोई विकल्प ही ना हो।

वैसे तो हम सब आजकल एंड्राइड फोन हाथ में लिए बोलते हैं और दिन भर सोशल मीडिया पर जुड़े रहते हैं किसी को जन्मदिन की शुभकामना देनी हो या कुछ और हम पीछे नहीं रहते फिर हम अपने अपनों से इतना पीछे कब रह गए पता ही नहीं चला नई टेक्नोलॉजी आती गई और हम पैसे खर्च करके उसे अपनाते गए कभी नहीं सोचा कि इसके दुष्प्रभाव क्या होंगे??

अपनों से बात करना अपनी समस्या बताना यह साझा करना क्या होता है यह सब भूल गए आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां हमारी युवा पीढ़ी सिर्फ और सिर्फ पैसे को प्राथमिकता देती है और कोई परेशानी आ जाए तो मनोचिकित्सक के पास जाना ज्यादा पसंद करती है बजाएं अपने माता पिता के इंसान पास बैठता जरूर है मगर फोन के साथ वो एकदम अकेला है और इस अकेलेपन में वह कब धीरे धीरे गलत मानसिकता का शिकार बन जाता है उसे पता ही नहीं चलता इसलिए आज पहले के मुकाबले में आत्महत्याएं बढ़ती जा रही हैं वैसे तो हम सकारात्मकता बात करते नहीं थकते मगर हम में से कितने लोग हैं जो इसे ठीक तरह से अपनाते हैं हमें आत्महत्याओं को रोकना होगा लेकिन कैसे?

हमें बचपन से ही अपने बच्चों को ध्यान योग ईश्वर से प्रार्थना उस को धन्यवाद देना और अपनी बातअपनों से बेझिझक होकर कह सके यह सब सिखाना होगा चाहे कितनी भी बड़ी गलती हो जाए बड़ों को भी बड़प्पन दिखाते हुए उन्हें माफ कर देना व सही राह दिखाना यही हमारी सीख होनी चाहिए। कुदरत ने हमारे लिए कुछ और अच्छा सोचा होगा वैसे भी हमारे बड़ों ने कहा है जब भी कोई जीवन में उतार-चढ़ाव हो तो अपने दिल की बात किसी करीबी से साझा कर ले तो दिल हल्का हो जाता है।

शिल्‍पा अरोड़ा
विदिशा मध्‍यप्रदेश


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