मदामृत-संतोष शान

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जीवन एक कठोर और अटल सत्य है  ,  सदैव कठिनाइयों से लड़कर , कष्टों को सह कर उनसे जूझना , हल निकालना और जीना इन सब परिस्थितियों से डरकर भागना या कोशिश करना केवल मूर्खता ही होती है परंतु आज जीवन के सभी कष्टों कठिनाइयों और समस्याओं से जूझने का हल कई लोगों ने बड़ा ही सरल बना डाला है जो मानवता ही नहीं सामाजिक नैतिकता की दृष्टि से भी अत्यंत घृणात्मक है और वह है मध्य पान यानी शराब  मदिरापान।यह लत ना तो व्यावहारिक दृष्टि से सही है और ना ही नैतिक दृष्टि से  बाहुबली राक्षसी की तरह मुंह बाए खड़ी महंगाई ने अधिकतम घरों में आर्थिक स्थिति को तोड़ मरोड़ कर रख दिया है  । जहां परिवार की आर्थिक रूप से होने वाली समस्त आपूर्ति न होने की वजह से दिनों दिन गृह क्लेश की घटना बढ़ती ही जा रही है जिस से प्रभावित होता है परिवार के प्रत्येक सदस्य का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य  मिलता क्या है  ! शांति !!? अथवा अत्यधिक पीड़ा , घुटन . फिर भी मनुष्य अपनी मूर्खता से इस मदिरा  का सेवन करता ही रहता है  ।
मनुष्य देखते हुए भी इतना अंधा हो जाता है कि उसे इसका अंदाजा भी नहीं रहता कि दुख कष्ट और कठिनाई तथा आपसी मनमुटाव या किसी भी प्रकार की कटुता को मिटाने भुलाने के लिए किया गया मदिरा पान उसके बहुत से सोचने समझने की शक्ति और समय पर काम आने वाली उसकी जमा पूंजी को भी नष्ट करवा देती है  परिणाम  ! मनुष्य जिस से भागने के लिए और दूर होने के लिए मदिरा का सेवन करता है वह धीरे-धीरे उससे भी भयानक और असहनीय कष्ट कठिनाई तथा दुखों के करीब पहुंचा कर अंततः मौत के समीप लाकर खड़ा कर देती है । 
यह तो रही कष्ट और दुख में पीने वालों की बात  , लेकिन क्या खुशी  और ‌उत्सव के मौके पर आज के आधुनिक तथाकथित लोग सामूहिक अथवा परिवार के साथ मदिरा पान नहीं करते  ?और इसे तो कुछ लोग सभ्यता का अंग समझते हैं समाज में स्वयं की ऊंची नाक और धाक बनाने के लिए कीमती मदिराओं  का देर रात तक सेवन करना ही कुछ लोगों की दृष्टि में इज्जत की जिंदगी माना जाता है ।
सोच की बात तो यह है कि मदपान चाहे दुख में सेवन किया जाए  ! अथवा खुशी या उत्सव मे !! ‌है तो बुरी ही ना  !? और मदिरापान एक सामाजिक पारिवारिक और साथ ही नैतिक बुराई भी है । बुराई तो बुराई है वह चाहे जैसी भी हो और इस बुराई की अंतिम मंजिल केवल विनाश ही तो है । आज समाज में कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो शौक के तौर पर कभी-कभी दो-चार घूंट पी लेते है । जब उनसे संपर्क किया गया और पूछा गया तो उनका सिर्फ दो टूक उत्तर था  "अरे भाई !  हम कोई रोज या ज्यादा थोड़े ही पीते हैं !! "अब जरा इन्हें कोई बताए ! कि अधिक तो अन्न ( भोजन ) भी विष के समान हो जाता है!! यह तो फिर भी विष है या यूं कहें कि साक्षात धीमा विष ( जहर ) है !!? थोड़ा क्या ज्यादा क्या   परिणाम तो दोनों तरह से एक ही होगा बस बर्बादी  ।
सुख-दुख खुशी अथवा उत्सव या कभी-कभी या फिर रीति रिवाज के नाम पर मदिरा  , शराब  प्रभाव तो विषैला ही छोड़ेगी ना  तो फिर क्यों इसका सेवन कर हम दुनिया भर के बहानों से खुद को छलें और लत बनाकर जीवन का सर्वनाश करें .! 
अतः यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो आपको किसी भी दवा सलाह या मुक्ति दिलाने जैसे झांसे में आने की कोई आवश्यकता नहीं है बशर्ते आपका इस बुराई को छोड़ने का संकल्प दृढ़ हो अतः इस बुराई के चक्रव्यूह में फंसकर अपनी पारिवारिक खुशी सुख अपनी जमा पूंजी अपनी कर्मठता और स्वास्थ्य को डूबने से बचा कर कष्ट दायक जीवन से मुक्ति पा लीजिए ।
साथ ही एक सभ्य और स्वस्थ नागरिक का परिचय देते हुए अपना बहुमूल्य जीवन शालीनता के साथ बिताए क्योंकि यह ऊपर से दिखाई देने वाली मदामृत‌ वास्तव में अंदर ही अंदर बिना आहट के प्रवेश करने वाली केवल मद मृत्य है जो स्वयं तो मृत है ही ही साथ ही उन सभी सेवन कर्ताओं को भी धीरे-धीरे मृत बना देती है।


संतोष शर्मा   शान
हाथरस ( उ, प्र ,)


 



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