मजदूर दिवस पर संतोष

सहा हरदम मैंने बातों को
नही उठाया कभी इन हाथों को
स्वीकार लिया जब मैंने उसके
दिये गये किमती चाँटो कों
                इसलिए मेरा निधन हो गया।


मैंने बनाया उनके ऊँचे मकानों को
मैंने सजाया उनके चमकते दुकानों को
चलते रहें हम उनके अनुसार
खोले नहीं कभी अपनी जुबानों को
               इसलिए मेरा निधन हो गया।


चाहा मैंने जब अपना घर बसाने को
चाहा जब अपनी दुःख मिटाने को
दबे रह गए मेरे अरमान जब,
वो कहे अपने चमचों से मुझे ठुकराने कों
               इसलिए मेरा निधन हो गया।


तोड़ा मैंने हाथों से बड़े बड़े चट्टानों को
झेला मैंने सागर में आने वाले तूफानों को
वो नहीं किए, गुजारिश हमारी पूरी
देना चाहा जब मैं अपने बेटे के मुस्कानों को
             इसलिए मेरा निधन हो गया।


संतोष कुमार वर्मा 'कविराज'
कोलकाता, पश्चिम बंगाल



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