भिन्‍ड़ी की भुजिया-किरण

लघुकथा


सुनो, कल आपने कितने लोगों को बुलाया है खाने के लिये ?...क्या क्या बनेगा खाने में जरा बता देते तो ठीक था | 'बना लो कुछ भी' ... वो सब तो ठीक है जी, पर सूखी सब्जी में क्या बनाऊं ? भिण्डी बना लूं क्या? जल्दी बन जाएगी|
भिण्डी की भुजिया छौकतें ही अचानक उसे ख्याल आया कि हमारी जिन्दगी भी तो भिण्डी की भाजी की तरह हो गई है| कम वक्त में अधिक पाने की चाह, जैसे कि आदमी न होकर मशीन हो गए हों | संवेदना विहीन किसी रोबोट की तरह... एक कार्य की समाप्ति तो दूसरे का आरम्भ | कट, कॉपी पेस्ट की तरह भागती दौड़ती सी जिंदगी, झटपट तैयार किसी भिण्डी की भाजी सी जिंदगी |


किरण बाला चंडीगढ़


 



 


 


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