गुलाब"
कठिन बेहद जीवन डगर
चल पाना नहीं कोई सरल
वेदना का पीना पड़े जहर
वक्त के चक्रवातों का कहर
हैं नुकीले कंटक यहाँ मगर
परिश्रम न जाए कभी व्यर्थ
झंझावातों से निकल निखर
स्वेद भी बन जाता है सुगंध
देता सीख,"यही है जीवन"
नित गुलाब हमें प्रतिक्षण
सत्कर्मों की बिखेर सुगंध
भर ह्रदय में उमंग- तरंग
कोमलता का कर वरण
अन्याय का तू कर दमन
नित श्रेष्ठ का सम्मान कर
पीड़ा में भी तू श्रृंगार बन
जीवन में भर कर नवरंग
प्रीत का एक पैगाम बन
देता सीख,'यही है जीवन"
नित गुलाब हमें प्रतिक्षण
----©किरण बाला
(चण्डीगढ़ )
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