रचनाकार संख्या -68
गँगा गंदगी से, भराकर चले हैं।
उसे नालियों से, मिलाकर चले हैं।।
गटर से मिले जब,नदी स्वच्छ धारा।
मलिन धार अपनी, बहाकर चले है।।
प्रचारी हवा से,हुआ स्वच्छ भारत।
प्रभारी सफाई, कराकर चले हैं।।
सफेदी झलकती,बना झाग पानी।
लगे बर्फ चादर बिछाकर चले हैं।।
बनारस गँगा से, कवायद शुरु है।
हवा दाग धब्बे ,छुड़ाकर चले है।।
महानद नदी से ,जुड़े तार सारे।
महल रेत में ही, बनाकर चले हैं।।
पले माफिया है, गँगा के सहारे।
नदी रेत से ही, कमाकर चले है।।
खिवैया अलग है ,अलग है खवैया।
खुले खान खाना,खिलाकर चले है।।
बचत टैंक पानी, बनी बंद बोतल।
रुपैया उसी से, बनाकर चले है।।
पियो शुद्ध पानी,कहें खेल प्रेमी।
बना ब्राण्ड अपना,बिकाकर चले है।।
डॉ रामकुमार चतुर्वेदी
सिवनी मध्यप्रदेश
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