पापों को ढकती रही - कान्‍ता अग्रवाल

रचनाकार संख्‍या - 60


 

मैं पवित्र बनी रही 

तुम्हारी पापों को ढकती रही 

अनंत विषों को पीकर भी

रिसते घावों को धोकर भी 

मैं मैली नहीं हुई...

 

पर देखो मेरे सीने में जाकर

अम्बार लगा दिया है तुमने 

गर्त के ढेरों के 

जिन्हें अब भी 

ढक रखा है मैंने...

 

उफ़ ! कितने निष्ठुर हो तुम 

पाषाण से कठोर

 न ओर देखते न छोर

मैं निशब्द सहती रही 

और सदियाँ बीत गई..

 

जानते हो क्यूँ?

सोचा था ,जीत पाऊंगी तुम्हें 

पर तुम स्वार्थी ,अहंकारी 

हर बार मुझ में डुबकी लगाते 

मेरी ममता को छलते 

फिर श्वेत वस्त्रों में 

आगे निकल पड़ते...

 

मैं अपराध बोध से ग्रस्त हूँ 

अपनों के बेगानेपन से त्रस्त हूँ 

काश़ !तुम को रोक पाती

 अपनी ममता का गला घोंट पाती 

और मैं विष बन जाती...

 

पर न कर पायी 

क्योंकि मैं एक माँ हूँ 

भारत की माँ -तुम सबकी माँ 

हाँ मैं हूँ ‘गंगा माँ ‘....

 

कान्ता अग्रवाल,गुवाहाटी

मौलिक 

प्रकाशनार्थ


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