अंतिम इच्छा - डाॅ.हंसा शुक्ला 

रचनाकार संख्‍या -69


किशन छत्तीसगढ के छोटे से गांव का किसान था। उसकी लगभग 2 एकड जमीन थी, जिससे उसके घर का गुजारा हो जाता था। किशन अपने दीदी-काका, अम्मा-बाबू से सुनता था कि मरने के बाद अस्थि को गंगा में विसर्जित करना चाहिए उससे आदमी जीवन-मरन के चक्र से मुक्त हो जाता है।
किशन के मन में ये बात घर कर गई। दीदी के मृत्यु के समय किशन 14-15 साल का था वह पहली बार बाबू के साथ बनारस गया, विधि-विधान से बाबू ने दीदी की अस्थि गंगा में प्रवाहित कर दी और किशन के साथ गंगाजल लेकर गांव आ गया। किशन असमंजस में था गंगा नदी में ऐसा क्या विषेश है, कि उसमें अस्थि विसर्जित करने से आत्मा मुक्त हो जाती है, उसमें डुबकी लगाने से पाप धुल जाते है। बाबू ने उसकी जिज्ञासा को षांत करने के लिए वेद एवं पुराण का हवाला देते हुये बताया कि गंगा सिर्फ नदी ही नही बल्कि देव नदी है, इसलिये उसमें अस्थि प्रवाह से आदमी जन्मजन्मांतर के बधंन से मुक्त हो जाता है।
 किशन पिता की बातो से समझ गया कि गंगा नदी की महिमा अन्य नदियों से अलग है, वह गंगा नदी को माॅं गंगा कहने लगा। किशन के काका, अम्मा, बाबू सब साथ छोडकर चले गये, सबकी अस्थि गंगा में प्रवाहित हुई, हर बार किशन गंगा का नया कलेेवर देखता और बढ़ते व्यवसायीकरण से उसका मन क्षुब्ध हो जाता था। मन ही मन सोचता गंगा मैया को पैसा कमाने का साधन बनाया जा रहा है, लोग अस्थि के नाम पर झिल्ली, प्लास्टिक और प्रदुशण की बहुत सी चीजों को प्रवाहित कर गंगा माॅं को प्रदुशित कर रहे है। किशन कम पढा-लिखा था पर वह प्रकृति को सरंक्षित रखने के लिये कटिबद्व था, उसे बाबू की बात याद थी हम प्रकृति की रक्षा करेगें तो वह हमारा पोशण करेगी हम इसे हानि पहुंचाएगे तो वह आपदा के रूप में ऐसा बदला लेगी कि हम सब नश्ट हो जायेगें। 
 किशन के बच्चे बडे़ हो गये थे किशन उन्हें बाबू-काका की बातें बताता। बेटा इंजीनियरिंग कर अच्छी कंपनी में नौकरी कर रहा था और बिटिया स्कूल में व्याख्याता थी। किशन के बच्चे भी प्राकृतिक साधनों का सदुपयोग करते उन्हें अपने पिता की सोच पर गर्व होता था कि कम पढ़े लिखे होने पर भी वह प्रकृति के प्रति कितने सजग है। किशन साल दो साल में परिवार के साथ गंगा मंॅा के दर्षन के लिए जाता। इस बार किशन दर्षन कर आया तो बहुत खुष था कि गंगा माॅं पहले से साफ हो रही है। किशन ने पत्नी और बच्चों से कहा अगर मुझे कुछ हो तो मेरी अस्थि गंगा में विसर्जित न करना बल्कि खाली जगह में गड्डा खोदकर, अस्थि में छायादार वृक्ष का बीज डालकर, ऊपर से मिट्टी डाल देना और फिर उसमें गंगाजल डाल देना जब पौधा अंकुरित होगा तब मैं समझुंगा गंगा माॅं मुझे मुक्त कर दिया। पत्नी ने भी किशन के इच्छा में हामी भरी और बच्चो को अपना भी क्रियार्कम वैसे ही करने को कहा।
 बच्चे बहुत खुश थे कि उनके माता-पिता कितने समझदार है, उनकी सोच कितनी अच्छी है। ऐसी सोच सबकी हो तो गंगा का प्रदुशण स्वमेव समाप्त हो जायेगा और देवनदी, जीवनदायनी गंगा प्रदुशण से मुक्त हो जायेगी। कुछ वर्शाे के बाद किशन की मृत्यु हो गई बेटे ने किशन की अस्थि के साथ पीपल का पौधा लगाया उसमें गंगाजल डालकर उसकी अंतिम इच्छा पूरी की। उसके बाद गंगा मॉं के पास जाकर पिता के संकल्प को दोहराया, आँखो का खारा पानी, गंगा के मीठे पानी में मिल गया, जैसे गंगा मॉं कह रही हो कि मैने तुम्हारे पिता को मुक्त किया और उसने इस रूढ़िवादी सोच से अलग काम कर मेरे पानी को अमृत बनाकर, मुझे मुक्त कर दिया।
बेटे को किशन को आवाज सुनाई दे रही थी। ‘‘जय मॉं गंगा, जीवनदायनी मॉं, हम आपकी रक्षा, करेगें आप हमें तारना जय मॉं गंगा।।“



डाॅ.हंसा शुक्ला 
प्राचार्य
स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय
हुडको, भिलाई (छ.ग.)


 



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