हम दो हमारे दो का नारा नया नही बहुत पुराना है। जीवन गाड़ी चार पहिए के सहारे आराम से खीचीं है। ऐसे में अचानक हम दो के बीच हमारे दो के कारण विवाद कराने चला आया आनलाइन क्लास। ये आनलाइन क्लासों का दौर 14 साल के बच्चों के जीवन की हवा जो पहले ही निकल चुकी है उसे पूरी ऐसा भ्रष्ट करने पर तुली है जिससे जीवन में लौटना आसान नहीं होगा। आनलाइन क्लास को यदि हम भष्मासुर का नाम दें तो बिल्कुल गलत नहीं होगा। ये क्लास न सिर्फ बच्चों की आँखों और उनकी जिंदगी को बर्बाद कर रहे हैं बल्कि मध्यवर्गीय परिवार को समस्याओं में भी डाल रहे हैं।
आमतौर पर देखा जाये तो परिवारों में एक मल्टीमीडिया सेट होता है या दो सेट। एक माँ एक पिता के पास , पिता अपने जीवकोपार्जन के कारण सुबह घर की चौखट छोड़ने के बाद शाम को कब लौटेगा इसका ठिकाना नहीं होता। ऐसे में बच्चों द्वारा उसके मोबाइल से आनलाइन क्लास तो संभव नहीं।अब यदि घर में दो ही बच्चे हैं और यदि मम्मी के पास एक मोबाईल है तो एक का काम तो चल गया, क्योंकि आनलाइन क्लासों का अधिकाशं समय तो एक ही है। तो बच्चा क्या करेगा? और यदि माँ खुद किसी स्कूल का हिस्सा हुई तो तब तो अब किताबों के साथ-साथ दो मोबाइल और खरीदने की जहमत उठानी ही होगी। ऐसे में अन्य जो समस्या आयेगी वह तो बाद की बात है आर्थिक परेशानी घर की डूबती अर्थव्यवस्था के बीच सामने खड़ी हो गई। मोबाइल लेना भी आसान नहीं, मोबाईल भी ऐसा हो जो आनलाइन क्लासों का न सिर्फ वज़न झेल सके बल्कि डिस्प्ले भी ऐसा हो जिसमें सब कुछ साफ दिखाई थे। ऐसा मोबाईल 8 हजार से नीचे संभव तो मुझे दिखाई नहीं दे रहा है। आप देखें बाजार में शायद आपको दिखा जाये। यह कहानी तो केवल हम दो हमारे दो की थी लेकिन माँ/सास के वशं के इंतजार में संख्या बढ़ गई तो भी हम दो हमारे तीन या हम दो हम दोनोंं के दो-दो तब यह समस्या कहाँ पहुँचेगी, इसका अंदाजा तो आप से अच्छा कोई लगा ही नहीं सकता। फिर भी माँ-बाप है समाज में बच्चों का बचपन छीन कर झूठी शान और मेरा बच्चा लाइन क्लास करता है कहने के लिए इसे भी सह जायेगें।यह आनलाइन क्लास का सबसे कम दुष्प्रभाव है। आगे कि कहानी तो अभी बाकी है। कसम मेरी पूर्व प्रेमिका ढ़कढ़कनियाँँ कि आप हिल जायेगें।
अखंड गहमरी
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