किन्नौर कैलाश 2025 और मणिमहेश कैलाश 2026 : दो यात्राएँ, दो अनुभव और एक ही आस्था

कभी-कभी जीवन में कुछ यात्राएँ हम स्वयं तय नहीं करते। परिस्थितियाँ, संयोग और मन की इच्छा मिलकर हमें किसी दिशा में ले जाते हैं, लेकिन कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं, जिनके बारे में मन में सहज भाव उठता है—“यह यात्रा मैंने नहीं चुनी, शायद मुझे बुलाया गया है।”

मेरे लिए वर्ष 2025 और 2026 ऐसे ही दो विशेष वर्ष रहे—दो वर्ष, दो कैलास और दो ऐसी यात्राएँ, जो केवल पर्वतों तक पहुँचने की यात्राएँ नहीं थीं, बल्कि मेरे लिए आत्मिक अनुभव और भीतर की यात्रा बन गईं। वर्ष 2025 में किन्नौर कैलाश और वर्ष 2026 में मणिमहेश कैलाश के दर्शन का सौभाग्य मिला। पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि इन यात्राओं को केवल तीर्थयात्रा कहना इनके महत्व को सीमित करना होगा। इनमें प्रकृति की विराटता, रास्तों की कठिनाइयाँ, थकान, उत्साह, प्रतीक्षा और सबसे बढ़कर महादेव के प्रति विश्वास, श्रद्धा और समर्पण था।

किन्नौर कैलाश—पहली पुकार

वर्ष 2025 की किन्नौर कैलाश यात्रा मेरे लिए एक विशेष आध्यात्मिक अनुभव थी। हिमालय की ऊँचाइयाँ मनुष्य को उसकी सीमाओं का एहसास कराती हैं। कठिन चढ़ाई, बदलता मौसम, पहाड़ों के संकरे रास्ते और चारों ओर फैली प्राकृतिक सुंदरता के बीच आगे बढ़ते हुए ऐसा लगता था जैसे बाहरी दुनिया पीछे छूट रही हो और मन प्रकृति के अधिक निकट पहुँच रहा हो।

कई बार शरीर थकता था, लेकिन मन में एक विश्वास बना रहा कि जब बुलावा आया है, तो मार्ग भी वही बनाएँगे। हिमालय की ऊँचाइयों पर जब किन्नौर कैलाश के दर्शन हुए, तो मन कुछ क्षणों के लिए जैसे ठहर गया। उस विराट स्वरूप के सामने यह अनुभूति हुई कि मनुष्य चाहे जितना कुछ प्राप्त कर ले, प्रकृति और परम सत्ता की विराटता के सामने उसका अस्तित्व कितना छोटा है।

वह क्षण केवल किसी पर्वत को देखने का नहीं था। प्रकृति, आस्था और मौन जैसे एक साथ उपस्थित थे। यात्रा से लौटते समय मन में गहरी शांति थी। तब कहाँ पता था कि अगले वर्ष महादेव एक और कैलास की ओर बुलाएँगे।

मणिमहेश—प्रार्थना से बुलावे तक

वर्ष 2026 में मणिमहेश कैलाश की यात्रा का अवसर सहजता से नहीं आया। आधिकारिक यात्रा 4 सितंबर से 19 सितंबर तक निर्धारित थी और मेरी भी इच्छा थी कि इसी अवधि में बाबा मणिमहेश के दर्शन करूँ। लगभग डेढ़ महीने तक यात्रा के लिए प्रयास करती रही। कई लोगों से साथ चलने का आग्रह किया, लेकिन किसी के सामने व्यक्तिगत परिस्थितियाँ थीं, कोई बाढ़ को लेकर चिंतित था और किसी को रास्तों की कठिनाइयों का भय था। धीरे-धीरे लगने लगा कि शायद इस वर्ष दर्शन संभव नहीं होंगे।

फिर भी मन ने हार नहीं मानी। मैंने बाबा से लगातार प्रार्थना की। उन दिनों मेरी प्रार्थना बस इतनी थी—“बाबा, अगर आपका बुलावा है, तो कोई न कोई रास्ता आप स्वयं बना दीजिए।”

इसी बीच हिमाचल प्रदेश में रहने वाले मेरे छोटे भाई से बात हुई। वे हिंदुस्तान पेट्रोलियम में रीजनल मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं। मैंने मणिमहेश जाने की इच्छा बताई तो उन्होंने कहा, “दीदी, आप आ जाओ, हम दोनों चलेंगे।” इस एक वाक्य से जैसे उम्मीद फिर जाग उठी। दूसरे छोटे भाई ने भी साथ चलने की सहमति दे दी। लगा कि बाबा ने रास्ता बना दिया है।

लेकिन यात्रा से ठीक पहले परिस्थितियाँ फिर बदल गईं। जिस रविवार को हमें दर्शन के लिए जाना था, उसी दिन हिमाचल में रहने वाले मेरे छोटे भाई की हरियाणा में आवश्यक मीटिंग लग गई और वे साथ नहीं आ सके। एक पल को लगा कि शायद यात्रा फिर रुक जाएगी, लेकिन दूसरे छोटे भाई ने मेरा साथ दिया और अंततः हम दोनों मणिमहेश की यात्रा पर निकल पड़े।

तब भीतर से एक बात बहुत गहराई से महसूस हुई—जब बुलावा सच्चा हो, तो रास्ते अपने आप बनते चले जाते हैं।

मणिमहेश पहुँचकर कैलाश के दर्शन हुए तो आँखें नम थीं और हृदय में केवल कृतज्ञता थी। जिस यात्रा के लिए डेढ़ महीने तक प्रतीक्षा और प्रार्थना करनी पड़ी, वह अंततः पूरी हुई। उस क्षण लगा कि यह केवल मेरी यात्रा नहीं थी, बाबा का बुलावा था।

मणिमहेश के धाम में बिताए वे क्षण मन में हमेशा के लिए अंकित हो गए। लौटने का समय आया तो शरीर तो वापस लौट रहा था, लेकिन मन बार-बार उसी कैलाश की ओर देख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी स्थान से नहीं, बल्कि किसी प्रिय आध्यात्मिक अनुभूति से कुछ समय के लिए विदा ले रही हूँ।

दो कैलास, एक ही आस्था

किन्नौर कैलाश और मणिमहेश कैलाश की यात्राएँ अलग थीं, लेकिन दोनों ने मेरे भीतर एक ही भाव को गहरा किया—महादेव के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता।

इन यात्राओं ने समझाया कि तीर्थ केवल किसी स्थान तक पहुँचने का नाम नहीं है। तीर्थ वह भी है, जहाँ मन कुछ समय के लिए अपनी चिंताओं से मुक्त हो जाए, जहाँ प्रकृति के सामने अहंकार छोटा पड़ जाए और जहाँ भीतर से केवल एक ही स्वर सुनाई दे—हर हर महादेव।

पहाड़ों की कठिन चढ़ाई ने धैर्य सिखाया, रास्तों ने विश्वास मजबूत किया, ऊँचाइयों ने विनम्रता सिखाई और कैलाश के दर्शन ने समर्पण को और गहरा किया। हिमालय की नीरवता में मन स्वयं से संवाद करने लगता है। रोजमर्रा की जिम्मेदारियों और चिंताओं के बीच हम स्वयं से दूर हो जाते हैं, लेकिन पहाड़ों के बीच पहुँचकर मन से सहज प्रश्न उठते हैं—हम वास्तव में क्या खोज रहे हैं? हमारी वास्तविक आवश्यकता क्या है? और सच्ची शांति कहाँ है?

शायद तीर्थयात्रा का वास्तविक अर्थ भी यही है—किसी धाम तक पहुँचने के साथ-साथ अपने भीतर के उस स्थान तक पहुँचना, जहाँ मन शांत हो सके।

जब 2025 और 2026 की इन यात्राओं को एक साथ देखती हूँ, तो मन में यही भाव आता है—यह केवल संयोग नहीं, प्रभु की कृपा है। वर्ष 2025 में किन्नौर कैलाश और वर्ष 2026 में मणिमहेश कैलाश—पंच कैलाश में से दो कैलाश के दर्शन का सौभाग्य बाबा ने मुझे प्रदान किया है। अब तीन कैलाश शेष हैं।

अब प्रार्थना केवल इतनी है कि बाबा महादेव अपनी कृपा बनाए रखें, जब भी बुलावा आए स्वयं मार्ग बनाएँ और शेष तीन कैलाशों के दर्शन का सौभाग्य प्रदान करें।

दो कैलाश का बुलावा मिल चुका है,
तीन कैलाश अभी शेष हैं…
अब आगे भी वही बुलाएँ, वही रास्ता बनाएँ और वही दर्शन कराएँ।

मेरे लिए 2025 और 2026 अब केवल कैलेंडर के दो वर्ष नहीं हैं। ये मेरे जीवन की दो ऐसी आध्यात्मिक स्मृतियाँ हैं, जिन्हें मैं सदैव अपने हृदय में संजोकर रखूँगी।

दो वर्ष…
दो कैलाश…
दो यात्राएँ…
और हर बार वही अनुभूति—
महादेव की कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं।

प्रभु से बस यही प्रार्थना है कि उनकी कृपा और आशीर्वाद सदैव बना रहे और जीवन की हर यात्रा मुझे उनके और निकट ले जाए।

हर हर महादेव।

डाॅ आरती बाजपेई 

लखनऊ 

+91 99193 35333