रचनाकार संख्या -24
सदियों से चलते चलते आज इस विराट स्थान पर , शीतल मन्द बयार ने थोड़ी देर के लिए मुझे विश्राम क्या दिया ' इस विश्राम में भी मुझे मेरी व्यथाओं ने विश्राम न लेने दिया। क्या करूं ! जन्म ही शायद मैंने व्यथाओं को सहने और दूसरों को सुख देने के लिए लिया था। जब किसी का जन्म होता है तब उसे कितना प्यार और दुलार मिलता है । लेकिन मेरा तो जन्म ही एक दो नहीं पूरे साठ हजार उन आत्माओं को तृप्त करते हुआ ।
जो अपने अकर्मो से श्रापित हो भस्म हुए थे। कितनी निर्मल पवित्र और श्वेत थी । जब उस कमंडल रुपी गर्भ से निकली , अपने श्वेत रुप श्वेतांबर आंचल को लहराती मुस्काती सुर्य की किरणों सी चमक लिए बर्फीली पहाड़ियों से जंगल , जंगल से समतल पठार खेत खलिहान से होती हुई छोटी बड़ी धारा रूपी बनकर पृथ्वी की गोद में आई तो आते ही हं ....हं इतना मान ! की मां का दर्जा पा लिया !! सोचा कि मां का स्थान है, तो पूजी जाऊंगी ' लेकिन ये क्या !? पूजी तो गई लेकिन कब ?? जब स्वयं पूरी तरह धूमिल गंदैली मल-मूत्र से दूषित करने के बाद । मेरे कुछ मानस पुत्रों को तरस आ भी गया तो कुछ कूपुत्रों ने यह कहकर मेरे आंसुओं में अपने गंदे वस्त्र बर्तन मल मूत्र आदि धो डाले की , अरे ये तो मां है ! और मां का तो फर्ज है बच्चों को माफ करना । कितनी सरलता से कह दिया , मैं स्तब्ध रह गई ' क्या पुत्र का कोई फर्ज नहीं होता ? मैं अत्यधिक दुखी तो तब हुई जब सड़े गले मुर्दे मवेशी फैक्ट्री और मिलों की सारी गंदगी और तो और सारे बड़े शहरों के सीवर पाइप की दुर्गंध भरी गंदगी मेरे श्वेत तन पर डाल कर मुझे दूषित कर दिया । किस रूप में आई थी मैं .... और अब ? ... करुं भी तो क्या । मेरी श्वेत निर्मल धारा पर लोग अपने सौंदर्य को निहार लेते थे भला मैं कहां जाऊं ...? मेरे धैर्य और सहनशीलता का ऐसा दुरुपयोग ! वह भी मेरे अपनों द्वारा । मुझसे ही मिलता है इन्हें मोक्ष और जीवन का अर्थ और ये मुझे ही अर्थहीन करने पर तुले हैं । कैसे कहूं ..... मेरा वह श्वेत निर्मल प्रवाह जब याद आता है ' मुझे कितना कष्ट देता है। क्या मुझसे भिन्न होकर इस पृथ्वी का कोई भी जीव सांस ले सकता है ..? क्या कोई जी पाएगा ! मुझ जैसी मां के विहीन संतान बनकर !? पृथ्वी का हर एक मानव मेरा ऋणी है , क्या वह मेरा लेश मात्र भी ऋण चुका सकता है ? नहीं ! तो फिर क्यूं .....??? कभी-कभी सोचती हूं तोड़ दूं अपनी मर्यादा और दिखला दूं अपना भी वेग , लेकिन फिर .…… पुत्र तो कुपुत्र होते देखे सुने हैं इस पृथ्वी पर यदि मुझ जैसी मां भी कुमाता हो गई तब ! और मेरा वेग !! उसे भी कौन संभालेगा । अब तो इस पृथ्वी पर मानव जाति के कुकर्मों और अनाचार तथा मेरी ऐसी दुर्दशा को देखकर वह भी नहीं आएंगे जिन्होंने मेरे निर्मल श्वेत वेग को प्रथम बार संभाला था । इससे तो मेरे निर्दोष पुत्र भी बिना दोष के दंड ........ नहीं नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकती ! .. क्यूंकि मैं .. मां हूं !! गंगा मां ।
लो ! फिर तेज बयार के झोंकों से बहती चट्टानों की श्रंखला के ऊपर आ गई हूं !! पुनः यहां झरना रूप में नीचे गिरकर नदी रूप में बहकर अपने पृथ्वी पर जन्मे मानव रूपी पुत्रों की हर दूषणता को अपने ऊपर समेटते हुए ' सागर में मिल जाने को ..... पर शायद इसी अवस्था में ... या फिर .....??? अब तो मुझे सिर्फ उन्हीं पुत्रों पर विश्वास है जो मुझे सिर्फ मां नहीं ..... मेरी तरह निर्मल उज्जवल और पवित्र मन से मेरा स्मरण गंगा मां के रूप में करते हैं !! ताकि मैं पुनः अपने उस श्वेत धवल रूप में पृथ्वी की गोद में खिलखिला सकूं मुस्कुरा सकूं अविरल अचल बह
सकूं ..... हर हर हर हर हर कर्णप्रिय ध्वनि करती हुई ।
संतोष " शान "
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